केंद्रीय सचिवालय सेवा के कर्मचारी
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सरकार की लेट लतीफी से सीएसएस संगठित कैडर ग्रुप 'ए' के जो फायदे अधिकारियों को मिलने चाहिए थे, वे नहीं मिल रहे। पदोन्नति के लिए विभागीय परीक्षा को लेकर भी मंत्रालय सुस्त है। करीब 4500 पद खाली पड़े हैं। इनमें सीएसएस कैडर की चालीस फीसदी क्षमता गिनी जाती है। इसका कारण छह साल से नियमित पदोन्नति नहीं होना है। केंद्र सरकार में सीएसएस के अधिकारी डीओपीटी के माध्यम से एक महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर काम करते हैं। सीएसएस फोरम (सभी सीएसएस अधिकारियों की एसोसिएशन) के महासचिव मनमोहन वर्मा का कहना है कि डीओपीटी ने आरक्षण नीति मामलों पर नोडल विभाग होने के नाते सभी विभागों/मंत्रालयों को अन्य सेवा/पदों पर, जरनैल सिंह मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के परिणाम तक, पदोन्नति देते रहने के निर्देश दिए हैं।
खास बात ये है कि अन्य सभी मंत्रालय और विभाग, डीओपीटी के निर्देशों के अनुसार सभी ग्रेडों में पदोन्नति कर रहे हैं, जबकि खुद डीओपीटी के अंतर्गत आने वाली सीएस डिवीजन अपने ही सीएसएस/सीएसएसएस/सीएससीएस अधिकारियों को समय पर पदोन्नति नहीं दे रही है। इससे अधिकारियों में गहरा असंतोष व्याप्त है। उन्हें न्यायोचित पदोन्नति से भी वंचित रखा जा रहा है। कई अधिकारी पिछले पांच छह वर्ष से उपलब्ध रिक्तियों पर पदोन्नति दिए जाने के पात्र हैं, लेकिन उन्हें अभी तक नियमित पदोन्नति नहीं दी गई है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का विरोध पहली बार हो रहा है। पहले भी कई बार ज्ञापन दिए गए हैं। इसके बावजूद एनएफयू एनएफएसजी के मामले लंबित पड़े हैं।