भारतीय जनगणना कभी भी परंपराओं में जकड़ी नहीं रही है। बदलते समय व उसकी नई आवश्यकताओं के हिसाब से जनगणना के तौर तरीकों में बदलाव किए गए। चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य के वक्त (321–296 ईसा पूर्व) अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र, में शासन व्यवस्था में जनगणना व कर प्रणाली का वर्णन किया है। मुगलकाल में आइने-अकबरी ग्रंथ में अकबर के शासनकाल के दौरान जनसंख्या, उद्योग, संपत्ति आदि का उल्लेख है। उस वक्त भूमि, जनसंख्या, अकाल आदि से संबंधित विस्तृत अभिलेख तैयार किये जाते थे। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान नियमित और व्यवस्थित रूप से जनगणना कराने की परंपरा शुरू हुई।
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रक्षा, राजस्व और कर संग्रह का महत्व अंग्रेजों ने समझा
ब्रिटिश शासन ने रक्षा, राजस्व ,व्यापार , सेवाओं और करों के संग्रह के लिए जनगणना का महत्व समझा और व्यवस्थित रूप से जनगणना कराने की परंपरा शुरू की। अंग्रेजों ने अलग अलग वक्त में कलकत्ता (1800), इलाहाबाद (1824), बनारस शहर (1827-28) और ढाका (1830) में जनगणना कराई। इसमें लिंग आयु, मकानों और संरचनाओं, किरायेदार के अलावा जाति-व्यवसायों की जानकारी ली गई।
देश में कभी लिंगानुपात था 100 पुरुषों पर 105 महिलाएं
1872 की जनगणना को हालांकि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारत की पहली आधुनिक जनगणना माना जाता है, लेकिन इस जनगणना में अंग्रेजों के कब्जे वाले या नियंत्रित सभी क्षेत्र शामिल नहीं हो पाए। 1871-72 के आंकड़ों के अनुसार भारत में उस वक्त लिंगानुपात 100 पुरुषों पर 105 महिलाएं थीं। यह असम, बंगाल, मैसूर और मद्रास में देखा गया।
17 फरवरी 1881 को पूरे देश में एक साथ जनगणना
1881 की जनगणना भारत की पहली ऐसी जनगणना थी जो पूरे देश में एक साथ कराई गई। 17 फरवरी 1881 को जनगणना दिवस घोषित करते हुए शाम से मध्यरात्रि तक डाटा संग्रह किया गया। इसमें 11 ब्रिटिश प्रांत और 7 रियासतें थीं। इसमें पहली बार भाषा संबंधी सवाल भी पूछे गए। उस वक्त फ्रांसीसी और पुर्तगाली क्षेत्रों में जनगणना नहीं हुई।
1891 में महिलाओं की शिक्षा पर पहली बार सवाल
आयु, लिंग, वैवाहिक स्थिति, जन्म-मृत्यु आंकड़े, महिला शिक्षा, भाषा, प्रवासन, रोजगार आदि की जानकारी 1891 की जनगणना में ली गई। इसमें सिक्किम, उत्तरी म्यांमार, वन क्षेत्र, पहाड़ी क्षेत्र, रेलवे प्रतिष्ठान, छावनियाँ और जल-आधारित आबादी को शामिल किया गया। 1901 की जनगणना 1 मार्च को हुई। बंगाल विभाजन का देश में व्यापक विरोध हुआ। बाद में 1912 में इस विभाजन को समाप्त कर दिया गया। इस कारण 1911 की जनगणना का फील्डवर्क अस्थायी प्रशासनिक सीमाओं के आधार पर हुआ। जनगणना दस्तावेजों का विभिन्न स्थानीय भाषाओं में अनुवाद किया गया।
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पूरे भारत में एक ही रात में जनगणना
जनगणना के इतिहास में 1921 की जनगणना खासी अहम रही। 18 मार्च 1921 को पूरे भारत में एक ही रात में जनगणना की गई। इस समय जनगणना रजिस्टर की शुरुआत की गई। गैर-नगरपालिका नगरों की सूची पहले से ही व्यापार, वाणिज्य और औद्योगिक स्थिति के आधार पर तैयार की गई थी। वैसे तो शुरू से ही जनगणना में जाति व धर्म संबंधी सवाल होते रहे हैं। 26 फरवरी 1931 को हुई जनगणना में आए आंकड़े अंतिम जातीय आंकड़े बन गए। 1941 की जनगणना के जाति आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए और आजादी के बाद जातिगत जनगणना बंद हो गई।
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