भारत की विदेश नीति को लेकर देश के शहरी युवाओं की सोच में बड़ा बदलाव आ रहा है। चीन के साथ रिश्तों को लेकर चिंता बढ़ी है और युवाओं को लगता है कि भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती अब चीन है। इस सोच का खुलासा हुआ है ओआरएफ के विदेश नीति 2024 में, जिसे भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने मंगलवार को लॉन्च किया। उन्होंने कहा कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था अब भौगोलिक और तकनीकी दोनों स्तरों पर चुनौतियों से जूझ रही है।
ओआरएफ के इस सर्वे में 5050 शहरी युवाओं से बातचीत की गई। सर्वे से साफ है कि 89% युवा भारत-चीन सीमा विवाद को सबसे बड़ी विदेश नीति चुनौती मानते हैं। वहीं, 66% युवाओं ने भारत-चीन संबंधों से असंतोष जताया, जो 2023 की तुलना में 17% ज्यादा है। इसके बाद पाकिस्तान से तनाव और सीमा पार आतंकवाद को भी गंभीर चिंता के रूप में बताया गया।
भारत की विदेश नीति पर भरोसा, लेकिन सावधानी जरूरी
सर्वे के मुताबिक, 88% युवाओं को भारत की मौजूदा विदेश नीति पर भरोसा है, जो बीते वर्षों से लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि, युवा अब सिर्फ भरोसे से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वे सरकार से स्पष्ट रणनीति की उम्मीद करते हैं। सर्वे में साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और सप्लाई चेन में रुकावट को भी प्रमुख वैश्विक चिंता बताया गया।
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जनरल चौहान ने बताया भारत का ‘विश्वबन्धु’ दृष्टिकोण
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने इस मौके पर कहा कि भारत अब वैश्विक मंच पर ‘विश्वबन्धु’ यानी भरोसेमंद साझेदार की भूमिका निभाना चाहता है। उन्होंने ब्रिक्स और क्वाड जैसे मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया और कहा कि भारत रणनीतिक रूप से स्वतंत्र रहते हुए सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखने की नीति पर काम कर रहा है।
पड़ोसी देशों में चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए चेतावनी
जनरल चौहान ने चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बनते समीकरणों, म्यांमार की स्थिति और हिंद महासागर क्षेत्र में बाहरी ताकतों की बढ़ती गतिविधियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने इसे भारत की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बताया और कहा कि युवाओं की राय को नीति-निर्धारण में शामिल करना अब जरूरी हो गया है।
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ओआरएफ का सर्वे बना युवाओं की सोच का आईना
ओआरएफ के अध्यक्ष समीर सरन ने बताया कि यह सर्वे न केवल विदेश नीति पर युवाओं की सोच को सामने लाता है, बल्कि नीति-निर्माण को अधिक समावेशी और भागीदारी वाला बनाने में मदद करता है। यह सर्वे 2021 में शुरू हुआ था और अब यह अंतरराष्ट्रीय मामलों पर जनमत का विश्वसनीय सूचक बन चुका है।