सीबीआई को सोमवार को उस वक्त एक बड़ी शर्मिंदगी से दो-चार होना पड़ा जब एक विशेष अदालत ने व्यवसायी हरीश गुप्ता को बरी कर दिया, जिस पर 1995 में जर्मनी में सीमेंस से एक एन्क्रिप्शन सिस्टम को राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के जाली प्रमाण पत्र के आधार पर आयात करने का प्रयास करने का आरोप लगाया गया था। अदालत ने इसे बकवास मामला करार दिया।
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अदालत ने कहा कि इस मामले में राष्ट्र की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा शामिल है, जिसकी गहरी जांच की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा लगता है कि जांच अधिकारी (आईओ) ने हल्की-फुल्की जांच भी नहीं की। अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि आईओ ने जानबूझकर या किसी उच्च अधिकारी के इशारे पर जांच नहीं की है और इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ये असली अपराधी या मौजूदा आरोपी को बचाने के लिए किए गया था। विशेष न्यायाधीश ने गुप्ता को जालसाजी के आरोपों से बरी कर दिया।
अप्रैल 1996 में जब देश में संसदीय चुनाव चल रहे थे, एनएसजी स्क्वाड्रन कमांडर विमल सत्यार्थी को बेल्जियम दूतावास से एक पत्र मिला जिसमें उन्हें सीमेंस एनवी, जर्मनी से एन्क्रिप्शन उपकरण के आयात के लिए अंतिम उपयोगकर्ता प्रमाणपत्र फिर से जारी करने के लिए कहा गया था। उपकरण केवल एक देश की कानून प्रवर्तन एजेंसियों को बेचा गया था और सत्यार्थी ने इंटरसेप्शन उपकरण के लिए कोई अंतिम उपयोगकर्ता प्रमाणपत्र जारी नहीं किया था जिसे उन्हें फिर से जारी करने के लिए कहा जा रहा था।