जस्टिस उपाध्याय की रिपोर्ट...15 मार्च को हटा दिया गया था मलबा
जस्टिस उपाध्याय की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा ने बताया कि जस्टिस वर्मा के 30, तुगलक क्रिसेंट, नई दिल्ली स्थित कार्यालय के पास स्टोर रूम में 14 मार्च की रात 11:30 बजे आग लगी। सीजेआई के निर्देश पर मैंने अरोड़ा से पीसीआर कॉल स्रोत व अन्य सूचनाएं मांगी। पुलिस आयुक्त ने 16 मार्च को बताया कि पीसीआर कॉल जस्टिस वर्मा के निजी सचिव द्वारा मोबाइल नंबर से की गई थी।
जस्टिस उपाध्याय ने बताया, स्टोर रूम गार्ड रूम के बगल में है, जहां सीआरपीएफ तैनात है। स्टोर रूम को बंद रखा जाता था। मैंने अपने रजिस्ट्रार सह सचिव को मौके पर भेजा। वह जस्टिस वर्मा के साथ उस कमरे में गए, जहां आग लगी थी। वह उनके कार्यालय से सटा हुआ है। रजिस्ट्रार ने रिपोर्ट दी कि कमरा स्टोर रूम के रूप में काम आ रहा था। कमरे में अंधेरा था। दीवारों में दरारें आ गई थीं।
जस्टिस उपाध्याय ने कहा, 16 मार्च की शाम दिल्ली पहुंचकर मैं तुरन्त आपके (सीजेआई) पास आया। सारी सूचना दी। 17 मार्च सुबह 8:30 बजे हाईकोर्ट के अतिथि गृह में जस्टिस वर्मा मुझसे मिले। उन्होंने कहा, जिस कमरे में आग लगी थी, वहां सिर्फ अनुपयोगी घरेलू सामान थे। कमरा नौकरों, माली व सीपीडब्ल्यूडी कर्मियों के लिए भी सुलभ था। घटना के समय वे भोपाल में थे, उन्हें बेटी से जानकारी मिली। तब मैंने उन्हें अपने व्हाट्सएप पर तस्वीरें व वीडियो दिखाए, जो पुलिस आयुक्त ने भेजे थे। जस्टिस वर्मा ने इस पर साजिश की आशंका जताई।
जस्टिस उपाध्याय ने कहा, 20 मार्च को मैंने फोटो, वीडियो और दो संदेश आपको (सीजेआई) भेज दिए। कल शाम मुझे आपका पत्र मिला, जिसमें जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेजने के प्रस्ताव की जानकारी थी। मैंने शाम को ही जवाब दिया कि प्रस्ताव न्याय के बेहतर प्रशासन के हित में है। जस्टिस उपाध्याय ने लिखा, मेरी जांच में आैर पुलिस आयुक्त की 16 मार्च की रिपोर्ट में भी खुलास था कि जस्टिस वर्मा के आवास पर तैनात गार्ड के अनुसार, 15 मार्च की सुबह कमरे से मलबा और अन्य जली वस्तुएं हटा दी गई थीं। लिहाजा पूरे मामले की गहन जांच की जरूरत है।
शीर्ष कोर्ट ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का जवाब भी जारी किया
जांच रिपोर्ट के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का जवाब भी जारी किया। अपने जवाबों में जस्टिस वर्मा ने आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा है कि यह स्पष्ट रूप से उन्हें फंसाने और बदनाम करने की साजिश प्रतीत होती है। उस स्टोररूम में उनके या उनके परिवार के किसी सदस्य द्वारा कभी कोई नकदी नहीं रखी गई थी। उन्होंने कहा कि वे इस बात की कड़ी निंदा करते हैं कि कथित नकदी उनकी थी। जिस कमरे में आग लगी और जहां कथित तौर पर नकदी मिली, वह एक आउटहाउस था न कि मुख्य भवन जहां न्यायाधीश और उनका परिवार रहता है।
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस संजीव खन्ना ने दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए तीन न्यायाधीशों की समिति गठित की। साथ ही मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय को फिलहाल जस्टिस वर्मा को कोई न्यायिक कार्य न सौंपने के लिए भी कहा गया है। सीजेआई जस्टिस खन्ना द्वारा गठित समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायाधीश अनु शिवरामन शामिल हैं।
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सीजेआई ने मांगी थीं ये जानकारियां
21 मार्च को सीजेआई के निर्देश पर जस्टिस उपाध्याय ने जस्टिस वर्मा से इन बिंदुओं पर लिखित में जानकारी मांगी।
- उनके घर से मिले नोटों के लिए वह कैसे जिम्मेदार हैं।
- यह नकदी उन्हें कहां से मिली, इसकी जानकारी दें।
- 15 मार्च सुबह अधजली नकदी व सामान किसने हटाए।
- साथ ही, यह भी : जस्टिस वर्मा के घर छह माह में तैनात रहे रजिस्ट्री स्टाफ, निजी सुरक्षा अधिकारी व कर्मियों का ब्योरा।
- दूरसंचार कंपनियों से जस्टिस वर्मा के आधिकारिक व अन्य नंबरों की छह महीने की कॉल डिटेल मांगी जाए।
- जस्टिस वर्मा अपने फोन से कोई भी डाटा डिलीट नहीं करें।
कौन हैं जस्टिस यशवंत वर्मा?
जस्टिस यशवंत वर्मा का जन्म 6 जनवरी 1969 को इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से बी.कॉम (ऑनर्स) की पढ़ाई की और मध्य प्रदेश के रीवा विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में उन्होंने कॉर्पोरेट कानूनों, कराधान और कानून की संबद्ध शाखाओं के अलावा संवैधानिक, श्रम और औद्योगिक विधानों के मामलों में भी वकालत की।
2016 में स्थायी न्यायाधीश के रूप में ली शपथ
56 वर्षीय न्यायाधीश, जो 1992 में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हुए थे, उन्हें 13 अक्टूबर 2014 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया और उन्होंने 1 फरवरी 2016 को स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।
कई पदों पर रहे
वह 2006 से अपनी पदोन्नति तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विशेष अधिवक्ता भी रहे, इसके अलावा 2012 से अगस्त 2013 तक उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता भी रहे, जब उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया।