NIA Court: मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने यह कहते हुए कार्यकर्ता वरवरा राव को हैदराबाद में स्थायी रूप से रहने की अनुमति देने से इनकार कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट की जमानत शर्तों में बदलाव निचली अदालत नहीं कर सकती। राव ने उम्र, बीमारियों और इलाज की सुविधा का हवाला दिया था। पढ़िए रिपोर्ट-
मुंबई की एक विशेष एनआईए अदालत ने एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले के आरोपी कवि व कार्यकर्ता वरवरा राव को अपने गृहनगर हैदराबाद में स्थायी रूप से रहने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि वह उन जमानत की शर्तों में बदलाव करने का अधिकार नहीं रखती, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है।
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वरवरा राव (85 वर्षीय) ने उम्र और आर्थिक कठिनाइयों का हवाला देते हुए एनआईए अदालत में हैदराबाद जाने की अनुमति मांगी थी। उनकी याचिका को विशेष जज चकोर बाविस्कर ने 16 मार्च को खारिज कर दिया। राव को 28 अगस्त 2018 को हैदराबाद स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया था और उनका मामला विचाराधीन हैं। उन्हें 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल आधार पर जमानत दी थी।
जमानत की शर्तें क्या हैं?
जमानत की शर्तों के अनुसार, राव को मुंबई में ही रहना होगा और एनआईए अदालत की अनुमति के बिना शहर से बाहर नहीं जा सकते। अपनी याचिका में उन्होंने कहा कि वह और उनकी पत्नी दोनों बीमार हैं और उन्हें परिवार के सहयोग की जरूरत है, जो हैदराबाद में रहता है।
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याचिका में वरवरा राव ने क्या कहा था?
राव ने यह भी कहा कि हैदराबाद में इलाज कराना उनके लिए आसान होगा, क्योंकि उनकी बेटी डॉक्टर से शादीशुदा है और उनकी पोती भी मेडिकल क्षेत्र में है। उन्होंने बताया कि मुंबई में सीमित आय के साथ रहना उनके लिए कठिन हो रहा है। एनआईए ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राव सुप्रीम कोर्ट की जमानत शर्तों में बदलाव चाहते हैं, जिसकी अनुमति निचली अदालत नहीं दे सकती।
अदालत ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश से आगे नहीं जा सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह केवल अस्थायी रूप से यात्रा की अनुमति दे सकती है, लेकिन स्थायी रूप से क्षेत्र छोड़ने की अनुमति नहीं दे सकती।
गौतम नवलखा का जिक्र क्यों किया?
राव ने अपनी याचिका में बॉम्बे हाई कोर्ट की ओर से सह-आरोपी गौतम नवलखा को दिल्ली जाने की अनुमति देने का भी हवाला दिया था। इस पर अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने यह फैसला विशेष परिस्थितियों में दिया था और इसे अन्य मामलों में उदाहरण के रूप में नहीं लिया जा सकता। यह मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे में आयोजित एल्गार परिषद कार्यक्रम में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से जुड़ा है, जिसके बाद अगले दिन भीमा-कोरेगांव युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई थी।