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सियासत: कश्मीर से केरल तक लड़ती है बसपा, जलवा सिर्फ उत्तर प्रदेश में रहा या एक बार मध्यप्रदेश में

Mon, 14 Jun 2021 07:27 PM IST
Harendra Chaudhary आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कभी उत्तर प्रदेश में नंबर वन रही बसपा मध्यप्रदेश में भी एक बार थी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी। मध्यप्रदेश में छोड़ सिर्फ पंजाब और दिल्ली में ही दहाई अंकों में पहुंचा बसपा का वोट प्रतिशत...
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मायावती के सथ अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला (फाइल)
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विस्तार
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बहुजन समाज पार्टी पूरे देश में दलितों की सबसे बड़ी पार्टी और हिमायती के तौर पर खुद को पेश करती है। शायद यही वजह है कि कांशीराम से लेकर मायावती तक ने अपनी पार्टी के विस्तार के लिए कश्मीर से केरल तक के विधानसभा चुनावों में बीते तीन दशक से लगातार हिस्सा लिया। अगर उत्तर प्रदेश को छोड़ दें तो बसपा अब तक सिर्फ मध्य प्रदेश में एक बार कांग्रेस और भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और 11 प्रत्याशी विधायक बनाए। उसके बाद पंजाब में एक बार 9 प्रत्याशी विधायक बन सके। अब बहुजन समाज पार्टी एक बार इसलिए फिर से चर्चा में है क्योंकि कभी बहुत लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन करने वाले अकाली दल के साथ बसपा ने पंजाब में हाथ मिलाया है।

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उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटों को जीतने वाली पार्टी बसपा ने अब तक बाहरी राज्यों में सिर्फ मध्यप्रदेश में ही सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। काशीराम के नेतृत्व में 1998 में बहुजन समाज पार्टी ने मध्य प्रदेश में 11 सीटें जीती थी। उस वक्त बहुजन समाज पार्टी मध्य प्रदेश में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि उसके बाद मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के सात से ज्यादा कभी भी विधायक नहीं बन सके,यह आंकड़ा कम ही हुआ। लेकिन 1990 से लेकर सन 2008 तक ऐसा कोई भी साल नहीं रहा जिसमें बसपा के मध्य प्रदेश में विधायक ना चुने गए हो। आज भी मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का वोट प्रतिशत तकरीबन छह फीसदी के करीब बना हुआ है। मध्य प्रदेश के बाद बहुजन समाज पार्टी ने पंजाब में 1992 में सबसे ज्यादा नौ विधानसभा सीटें जीती थी। मध्य प्रदेश और पंजाब के बाद बसपा ने राजस्थान में भी अपना विस्तार करने की कोशिश तो की लेकिन 2008 में छह और 2018 में बसपा के छह प्रत्याशी विधायक बन सके।

बसपा से जुड़े एक प्रमुख नेता ने बताया कि उनकी पार्टी दलितों की लड़ाई के लिए पूरे देश के अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनाव के माध्यमों से और अलग-अलग आंदोलनों और संगठन के लोगों को जोड़ करके उपस्थिति दर्ज कराती रहती है। यही वजह है कि ज्यादातर उत्तर भारत के सभी राज्यों जिसमें जम्मू एंड कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र में चुनाव लड़ती रही है। जम्मू कश्मीर में 1996 के हुए चुनाव में बसपा को चार सीटें भी मिली थीं। जबकि 1995 से लेकर 2005 तक बिहार में भी बहुजन समाज पार्टी सीटें जीतती रही है।
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हालांकि यह बात अलग है कि 1990 से लेकर 2019 तक यानी कि तकरीबन तीन दशक तक महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने के बाद आज तक बसपा को वहां कभी कोई सफलता नहीं मिली। जबकि महाराष्ट्र में दलितों की अच्छी खासी आबादी है। बसपा के मिशन से जुड़े हुए केंद्रीय कार्यालय के प्रमुख नेता ने बताया कि मायावती दक्षिण भारत में भी उतनी ही आक्रामकता से चुनाव लड़ने की तैयारियां कर रहीं हैं जितनी उत्तर भारत में। यही वजह है कि तेलंगाना केरल कर्नाटक जैसे राज्यों में बसपा अपने प्रत्याशी उतारती है। 2018 में तो कर्नाटक में एक सीट भी बहुजन समाज पार्टी को मिली थी।

दलित समुदाय में लोगों को जागरूक करने और उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने के साथ-साथ उन्हें जनैतिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। राजनीतिक रूप से चुनाव में भागीदारी करते हुए बसपा को उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन सबसे ज्यादा मजबूत नजर आई। यहां के विधानसभा चुनाव में बसपा ने अच्छा प्रदर्शन किया और कभी कांग्रेस तो कभी समाजवादी पार्टी और कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकारें भी बनाईं। 2007 में बहुजन समाज पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई हालांकि उसके बाद पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिरता रहा।

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