बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्रीय मंत्री नारायण राणे के बंगले मामले में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) से नाराजगी जताई है। अदालत ने बीएमसी को निर्देश दिया है कि वह केंद्रीय मंत्री नारायण राणे के बंगले में अनाधिकृत निर्माण को फिर से नियमित करने पर विचार कर सकता है।
इससे पहले बीएमसी ने जून में राणे की कंपनी द्वारा नियमितीकरण के लिए किए एक आवेदन को खारिज कर दिया था। इसके बाद नारायण राणे के स्वामित्व वाली कंपनी ने इसके खिलाफ अदालत का रुख किया था। गौरतलब है कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार जब महाराष्ट्र में सत्ता में थी तब बीएमसी ने उनका पहला आवेदन खारिज कर दिया था। न्यायमूर्ति आर डी धानुका और न्यायमूर्ति कमल खता की खंडपीठ ने मंगलवार को इस मामले में सुनवाई के दौरान पूछा कि नगर निकाय पहले आवेदन को खारिज करने के बाद दूसरे आवेदन पर कैसे विचार कर सकता है। इस पर नारायण राणे की फर्म और बीएमसी दोनों के वकीलों ने कहा कि कानून और मौजूदा नियमों के अनुसार, एक दूसरे आवेदन पर विचार किया जा सकता है।
इसके बाद अदालत ने कहा कि क्या इस अदालत द्वारा पारित आदेश (राणे की याचिका को खारिज करने के बीएमसी के पहले फैसले को स्वीकार करते हुए) का कोई सम्मान नहीं है? अदालत ने कहा कि 'यह कभी खत्म नहीं होगा। एक बार एक अदालत द्वारा आदेश पारित कर दिया गया है, तो आप फिर से एक अलग स्टैंड लेते हैं। क्या बीएमसी अदालत से ऊपर है?
फिलहाल पीठ ने नारायण राणे स्वामित्व वाली कंपनी कालका रियल एस्टेट्स द्वारा दायर याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। इस कंपनी ने अपनी याचिका में बीएमसी को उनके दूसरे आवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जो पहले नागरिक निकाय द्वारा पारित आदेशों से प्रभावित नहीं था। सुनवाई के दौरान बीएमसी के वकील अनिल सखारे ने कहा मौजूदा मामले में बीएमसी दूसरे आवेदन पर विचार करेगी और आदेश पारित करेगी। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता शार्दुल सिंह ने अदालत से कहा कि अगर आवेदन की अनुमति दी जाती है तो वे निर्धारित समय के भीतर सभी कानूनी आवश्यकताओं का पालन करने का वचन देते हैं।