प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को हैदराबाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे समाज के हर तबके की आकांक्षाओं को पूरा करने का बीड़ा उठाएं। पीएम ने कहा कि इसके लिए भाजपा नेताओं को सभी तबकों से संपर्क बढ़ाना चाहिए और दलित और पिछड़े मुस्लिमों का समर्थन जुटाने की कोशिश भी करनी चाहिए। इस दौरान पीएम ने पसमंदा मुस्लिमों का खासतौर पर जिक्र किया।
गौरतलब है कि पीएम मोदी ने पसमंदा मुस्लिमों का जिक्र ऐसे समय में किया है, जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में बलिया के नेता दानिश अंसारी को अल्पसंख्यक मंत्रालय में राज्यमंत्री का पद सौंपा है। चौंकाने वाली बात यह है कि अंसारी पूरे कैबिनेट में इकलौते मंत्री हैं। वे इसी पसमंदा समुदाय से आते हैं। ऐसे में यह जानने वाली बात है कि आखिर पसमंदा मुस्लिम कौन हैं? आखिर क्यों मोदी सरकार ने इन्हें अपनी प्राथमिकता करार दिया है? इसके अलावा मुस्लिमों में इस समुदाय की क्या अहमियत है?
कौन हैं पसमंदा मुस्लिम?
पसमंदा एक फारसी शब्द है, जिसका अर्थ है 'पीछे छूटा हुआ'। उत्तर प्रदेश, बिहार और भारत के कुछ अन्य हिस्सों में पिछड़ी जाति के मुस्लिमों को इसी पसमंदा शब्द से पहचाना जाता है। दरअसल, एशिया के मुस्लिमों में जाति व्यवस्था बिल्कुल उसी तरह लागू है, जिस तरह भारत के हिंदू समाज में। भारत में रहने वाले मुस्लिमों में 15 फीसदी उच्च वर्ग या सवर्ण माने जाते हैं। इन्हें अशरफ कहा जाता है। माना जाता है कि यह मुस्लिम अफगानिस्तान और मध्य एशिया से आए और हिन्दू उच्च वर्ग से धर्मांतरण कर मुस्लिम बने। इनमें शेख, सैयद, मिर्जा, मुगल और खान शामिल हैं। मुस्लिमों में 15-20 फीसदी आबादी इसी तरह मुस्लिमों में बिरादरियां भी बंटी होती हैं। जैसे सैयद बिरादरी को सवर्णों में हिंदू की ब्राह्मण जाति जैसा स्तर मिला है।
लेकिन इसके अलावा बाकि बचे 85 फीसदी अरजाल और अजलाफ यानी दलित और पिछड़ी जाति के ही माने जाते हैं। अरजाल वे मुस्लिम कहे जाते हैं, जो पिछड़ी जातियों के हिंदू धर्म बदलकर मुस्लिम बने और अरजाल वे मुस्लिम हैं जो दलित-अति पिछड़ी हिंदू जातियों से मुस्लिम बने। इन्हें मुस्लिमों में सबसे पिछड़ा और कमजोर तबका कहा जाता है। पसमंदा शब्द को मुस्लिमों ने 1998 में अपनाया। इस कदम की वजह सवर्ण जाति के मुस्लिमों यानी अशरफों का विरोध था। भारत में पसमंदा आंदोलन 100 साल पुराना है। पिछली सदी के दूसरे दशक में एक मुस्लिम पसमंदा आंदोलन खड़ा हुआ था।
कबसे उठ रहा है पसमंदा मुस्लिमों का मुद्दा?
भारत में 90 के दशक के अंत में पसमंदा मुसलमानों के हक की आवाज उठाने वाले दो संगठन खड़े हुए थे। ये थे ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा,जिसके नेता एजाज अली थे। इसके अलावा पटना के अली अनवर ने ऑल इंडिया पसमंदा मुस्लिम महज नाम का संगठन खड़ा किया। ये दोनों संगठन देशभर में पसमंदा मुस्लिमों के तमाम छोटे संगठनों की अगुआई करते हैं। हालांकि कि दोनों को ही मुस्लिम धार्मिक नेता गैर इस्लामी करार देते हैं। पसमंदा मुस्लिमों के तमाम छोटे संगठन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में ज्यादा मिल जाएंगे।
भाजपा कैसे उठा सकती है फायदा?
भाजपा आगामी चुनावों में अजेय रहने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझावों के अनुरूप अलग-अलग राज्यों में अपने पक्ष में नई सोशल इंजीनियरिंग की तैयारी कर रही है। इस क्रम में राज्यों में उन जातियों-वर्गों को साधने की रणनीति बन रही है, जिससे जुड़े अधिकांश मतदाता अब तक पार्टी से दूर रहे हैं। दरअसल, राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पीएम ने भाजपा को अजेय बनाने के लिए विभिन्न सामाजिक समीकरणों के साथ और अधिक नए प्रयोग करने का सुझाव दिया है। और खासकर उत्तर प्रदेश में पसमंदा मुसलमानों के बीच पैठ बनाने का सुझाव दिया है।
उत्तर प्रदेश में मुसलमान प्रभाव वाली आजमगढ़ लोकसभा सीट पर उपचुनाव में मिली जीत के दौरान पीएम ने हस्तक्षेप किया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा को विभिन्न सामाजिक समीकरणों के साथ नए प्रयोग करने होंगे। यह पता करना होगा कि बीते आठ वर्षों में सरकारी नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं से मिले लाभ के बाद उस वर्ग का लाभार्थी क्या महसूस कर रहा है जो अब तक हमसे दूर है। पीएम ने कहा कि आजमगढ़ और रामपुर के नतीजे बताते हैं कि दूसरे दलों द्वारा दलितों, यादवों और अल्पसंख्यकों के साथ साधे गए समीकरण कमजोर पड़े हैं।
पर पसमंदा मुस्लिमों पर ही क्यों नजर?
पीएम ने कहा था कि उत्तर प्रदेश के लिए चुनावी नतीजे और विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर वैज्ञानिक विश्लेषण की जरूरत है। इस क्रम में राज्य में पसमंदा मुसलमानों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। दूसरे दलों से जुड़े उन वर्गों पर भी ध्यान देने की जरूरत है, जिनका संबंधित दलों से आकर्षण कम हुआ है। पीएम ने कहा कि नए सामाजिक समीकरणों के साथ और प्रयोग करने की जरूरत है, जिससे पार्टी के समर्थन का दायरा और बढ़े।
यूपी में पसमंदा ही क्यों?
यूपी में दलित मुसलमान (पसमांद) पर भाजपा की लंबे समय से नजर है। सीएसडीएस-लोकनीति के मुताबिक बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुसलमानों के आठ फीसदी तो सपा को 70 फीसदी वोट मिले थे। यह बीते लोकसभा चुनाव से एक फीसदी ज्यादा था। अमेरिका स्थित प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को मुसलमानों के 20 फीसदी मत मिले थे। उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ चुनावी रणनीतिकार के मुताबिक वोट देने वालों में ज्यादातर पसमंदा थे, जिन्हें सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और नीतियों का लाभ मिला था। यूपी में इनकी आबादी 80 फीसदी है।
बदली रणनीति का संकेत
पीएम मोदी ने राज्यसभा चुनाव में स्वयं इस बात का संकेत दिया था कि भविष्य में भाजपा पसमंदा मुसलमानों पर करेगी। पार्टी ने अगड़े मुसलमानों में शामिल अपने तीनों चेहरों एमजे अकबर, मुख्तार अब्बास नकवी और जफरुल इस्लाम को टिकट नहीं दिया था। चर्चा है कि इसी महीने राज्यसभा में मनोनीत होने वाले सात हस्तियों में एक पसमंदा मुस्लिम वर्ग से होगा। पार्टी ने अरसे बाद इसी वर्ग से जुड़े और सालों से हाशिये पर रहे साबिर अली की सुध ली है। इसी वर्ग के दानिश अंसारी को योगी मंत्रिमंडल में शामिल किया।