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यूपी चुनाव:सपा के झगड़े से गदगद हुई भाजपा

Mon, 09 Jan 2017 06:02 PM IST
शशिधर पाठक/ अमर उजाला, दिल्ली
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बीजेपी
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समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश के बीच मचे घमासान से किसी और दल को कोई नुकसान भले न हो, लेकिन इससे भाजपा को फायदा होता जरूर दिख रहा है। मुलायम सिंह यादव के साथ-साथ पार्टी के शीर्ष नेता भी महसूस कर रहे हैं कि पार्टी में मची तनातनी से गैर भाजपाई वोटों का संशय बढ़ रहा है।
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राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजीत सिंह और जद(यू) केसी त्यागी भी मानते हैं कि समाजवादी पार्टी में मचे घमासान का धर्मनिरपेक्ष दलों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, समाजवादी पार्टी में मचे घमासान पर भाजपा लगातार नजर रख रही है।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी मुलायम और अखिलेश के बीच में झगड़े को लेकर लगातार तंज कसते रहे हैं। प्रशांत किशोर की टीम में काम कर चुके सूत्र का कहना है कि इससे राज्य में जहां अगड़ी जाति के मतदाताओं का संशय बढ़ रहा है, वहीं अल्पसंख्यक, अन्य पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़े समुदाय में भी भ्रम की स्थिति बढ़ रही है।
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राहुल गांधी के किसान आंदोलन तक प्रशांत किशोर की टीम का हिस्सा रहे सूत्र का कहना है कि झगड़े के चलते कांग्रेस समेत कई दलों का चुनाव प्रचार अभी तक गति नहीं पकड़ पाया है।
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अगड़ों का संशय

कांग्रेस ने इस साल राज्य में अपनी जड़े मजबूत करने के लिए अगड़ी जाति और खासकर ब्राह्मण पर दांव लगाया था। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना, प्रमोद तिवारी और संजय सिंह का कद बढ़ाना इसी का हिस्सा था। इसी तरह से 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ तल्ख टिप्पणी करने वाले इमरान मसूद को प्रदेश कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया। बताते हैं इसका असर भी दिखना शुरू हो रहा था लेकिन अचानक समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की चर्चा शुरू हो गई। इस क्रम में प्रशांत किशोर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश से मिल आये और तब से कांग्रेस का चुनाव प्रचार करीब-करीब खामोश सा है।

अल्पसंख्यक और अन्य पिछड़े

अल्पसंख्यकों के रुझान को लेकर राजनीतिक पंडित भी गुणा-भाग में लगे हैं। हालांकि मायावती ने अल्पसंख्यक समाज पर खास दांव लगाया है। 2017 के चुनाव में उनकी सोशल इंजीनियरिंग का यह वर्ग मुख्य हिस्सा है। 403 सदस्यीय विधानसभा में बसपा ने 97 अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी में मचे राजनीतिक झगड़े पर उसकी भी निगाह है। माना जा रहा है कि इस समाज का रुझान भाजपा को हराने वाले दल की तरफ रहेगा। समाजवादी पार्टी के अखिलेश धड़े के साथ कांग्रेस का गठबंधन होने की स्थिति में नए राजनीतिक समीकरण भी बनेंगे। लेकिन अभी जबतक यह स्थिति साफ नहीं होती तबतक कुछ नहीं कहा जा सकता। इसी तरह की स्थिति अन्य पिछड़ो(अति पिछड़ों) को लेकर भी है। हालांकि भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष, स्वामी प्रसाद मौर्य को पार्टी में लेकर एक सामाजिक समीकरण का संकेत दिया है। अपना दल की अनुप्रिया पटेल के साथ भाजपा का गठबंधन भी है लेकिन कोइरी, कुर्मी, कुशवाहा, नोनिया, लोहार, कुम्हार(प्रजापति), निषाद समेत अन्य में सेंध लगने की संभावना मौजूद है। 2012 विधान सभा चुनाव में इनमें से अधिकांश वोट समाजवादी पार्टी के पाले में गए थे। इन सभी पर भाजपा की नजर है।

कहां है भाजपा की नजर

भाजपा की नजर राजनीतिक दलों के वोटों में बिखराव पर है। जिस दल के हिस्से से जितने पारंपरिक वोट हिलेंगे, भाजपा की स्थिति मजबूत होने की संभावना उतनी अधिक बनती जाएगी। पश्चिमी उ.प्र. में जाट वोटों पर भी पार्टी की पूरी निगाह है। ऐसे में भाजपा को समाजवादी पार्टी में मचे झगड़े से राजनीतिक फायदा दिखाई पड़ रहा है।
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