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Haryana: हरियाणा की 'लाल' विरासत में BJP की सेंध, 10 साल की एंटी-इनकम्बेंसी पर सवार कांग्रेस, मुश्किल में कौन?

सार

हरियाणा में एक अक्तूबर को सभी 90 सीटों पर मतदान होगा। नतीजे, चार अक्तूबर को आएंगे। प्रदेश में आम आदमी पार्टी ने भी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। जननायक जनता पार्टी (जजपा) ने चंद्रशेखर आजाद की 'आजाद समाज पार्टी' (कांशीराम) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। जजपा 70 सीटों पर तो आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।
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हरियाणा की सियासत। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हरियाणा में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। कांग्रेस और भाजपा, दोनों पार्टियों के बीच इस बार कांटे का मुकाबला होने के आसार हैं। हालांकि अभी तक दोनों ही दलों के उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं हुई है। भाजपा, प्रदेश के तीन 'लाल' परिवार, यानी पूर्व सीएम चौ. देवीलाल, चौ. बंसीलाल और चौ. भजनलाल की विरासत संभालने वालों में सेंध लगा चुकी है। वर्तमान में इन तीनों ही परिवारों का कोई न कोई सदस्य 'भाजपा' में शामिल हो चुका है। विधानसभा चुनाव में इन तीनों ही परिवारों के सदस्यों की टिकट के लिए तगड़ी दावेदारी भी है। जहां एक तरफ कांग्रेस पार्टी, भाजपा के 10 साल की एंटी-इनकम्बेंसी पर सवार है तो वहीं भाजपा 'लाल' परिवारों पर भरोसा जता, चुनावी मुकाबले को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस बार का विधानसभा चुनाव, बहुत रौचक होगा। अपनी जीत के प्रति भले ही दोनों पार्टियां आश्वस्त हैं, मगर एंटी-इनकम्बेंसी के चलते भाजपा की राह कुछ मुश्किल होती दिखाई पड़ रही है।

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हरियाणा में एक अक्तूबर को सभी 90 सीटों पर मतदान होगा। नतीजे, चार अक्तूबर को आएंगे। प्रदेश में आम आदमी पार्टी ने भी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। जननायक जनता पार्टी (जजपा) ने चंद्रशेखर आजाद की 'आजाद समाज पार्टी' (कांशीराम) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। जजपा 70 सीटों पर तो आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इनके अलावा इनेलो ने भी बसपा के साथ चुनावी गठबंधन किया है। कुछ सीटों को छोड़कर मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच रहेगा। भाजपा को उम्मीद है कि उसे 'लाल' परिवारों की विरासत को संभालने वाले कुछ सदस्यों के साथ आने का फायदा मिलेगा। चौ. देवीलाल परिवार के सदस्य चौ. रणजीत सिंह चौटाला, भाजपा में हैं। वे हरियाणा सरकार में बिजली मंत्री हैं। पार्टी ने उन्हें लोकसभा टिकट भी दिया था, मगर वे हार गए। अब चौटाला ने कहा है कि भाजपा उन्हें रानियां सीट से टिकट देती है, तो ठीक है, वरना भाजपा अपना देख ले। 

प्रदेश की सियासत में रणजीत चौटाला के इस बयान ने भाजपा को असहज स्थिति में ला दिया है। प्रदेश की राजनीति को करीब से जानने वाले रविंद्र कुमार बताते हैं, भाजपा ने जब 'लाल' परिवारों के सदस्यों को भगवा पटका पहनाया, तो उसके नेताओं को यह उम्मीद थी कि उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में पार्टी की राह आसान हो जाएगी। दूसरा जाट वोट बैंक, जो भाजपा से पूरी तरह छिटक चुका है, उसके निकट आने की उम्मीद की गई थी। इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दस में से पांच सीटें खो दी हैं। पार्टी को जाट समुदाय की नाराजगी का सामना करना पड़ा। खुद रणजीत चौटाला, चुनाव हार गए। ऐसे में भाजपा को चौ. देवीलाल परिवार के सदस्य रणजीत सिंह चौटाला के आने का ज्यादा फायदा नहीं हुआ। 
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चौ. बंसीलाल परिवार से उनकी पुत्रवधू किरण चौधरी ने पिछले दिनों भाजपा ज्वाइन कर ली थी। भाजपा कोटे से अब वे राज्यसभा में भी पहुंच गई हैं। उनकी बेटी श्रुति चौधरी इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा टिकट की मजबूत दावेदार हैं। भाजपा को उम्मीद है कि उसे भिवानी जिले की कुछ सीटों पर फायदा होगा। हालांकि इस बार प्रदेश में जिस तरह की टक्कर है, उसमें किसी दल को परिवार विशेष से कोई फायदा होगा, ऐसी गुंजाइश कम ही है।

तीसरा लाल परिवार चौ. भजनलाल का है। उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई भाजपा में हैं। उनका बेटा, भव्य बिश्नोई विधायक है। वे इस बार भी टिकट के प्रबल दावेदार हैं। राजनीतिक जानकार के मुताबिक, अब प्रदेश में ऐसा कोई 'लाल' परिवार नहीं है, जिसका प्रभाव अधिकांश सीटों पर हो। ये राजनीतिक घराने अब कुछ ही सीटों तक सिमट गए हैं। रणजीत चौटाला और किरण चौधरी, भाजपा की बड़ी मदद कर पाएंगे, ऐसा कहना बहुत मुश्किल है। ये नेता विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए जाट समुदाय के वोट खींच पाएंगे, ये आसान नहीं है। कुलदीप बिश्नोई परिवार भी करीब करीब अपनी ही सीट तक सीमित है। उनके भाई चंद्रमोहन कांग्रेस पार्टी में पंचकुला और कालका सीट तक ही सक्रिय हैं। 

बतौर रविंद्र कुमार, लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि हरियाणा में भाजपा को जाट समुदाय का समर्थन नहीं मिलेगा। भाजपा के लिए दस साल की एंटी-इनकम्बेंसी, कांग्रेस को फायदा पहुंचा सकती है। चुनाव से कुछ माह पहले मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को हटाकर उनकी जगह नायब सैनी को ले आना, भाजपा को इसका ज्यादा फायदा मिलता हुआ नहीं दिख रहा है। नतीजा, पार्टी को अपनी पहले वाली सोशल इंजीनियरिंग पर लौटना पड़ा है। जिस वर्ग यानी गैर जाटों को भाजपा अपना बताने का दावा करती है, उसकी संख्या करीब 75 फीसदी है।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने पूरी तरह से जाट समुदाय का समर्थन हासिल किया है। जाट वोटों पर अपना हक जताने वाली इनेलो और जजपा, को नकार दिया गया। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मौजूदा समय में एक मात्र जाट नेता के तौर पर स्थापित हुए हैं। हालांकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल जाट समुदाय का ही नहीं, बल्कि गैर जाट वोटरों का भी समर्थन हासिल था। विशेषकर एससी समुदाय के लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया है। दूसरे समुदाय के लोग भी कांग्रेस के पक्ष में खड़े हुए नजर आए। भाजपा ने जाट समुदाय के वोट हासिल करने के लिए तमाम प्रयास किए, मगर उसे समर्थन नहीं मिल सका। अब विधानसभा चुनाव में भाजपा, अपनी एंटी-इनकम्बेंसी को कितना दूर कर पाती है, ये तो नतीजे ही बताएंगे। मौजूदा स्थिति में कांग्रेस पार्टी, भाजपा की एंटी-इनकम्बेंसी को खूब भुना रही है।  
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