पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की तरफ से जारी की गई अध्ययन रिपोर्ट पर गौर किया। इस रिपोर्ट में राज्य के 14 शेल्टर होम में यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म के मामले होने की बात कही गई है। इसमें लड़कों के एक शेल्टर होम में लड़के के साथ कुकर्म होने की बात है।
जबकि एक अन्य शेल्टर होम में एक बच्चे के खाना पकाने से इनकार करने पर उसके गाल पर धारदार चीज से वार करने का ब्योरा दिया गया है। इस मामले में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। पीठ इससे बेहद नाराज दिखाई दी और एतराज जताया है कि रिपोर्ट में दिए गए सभी मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
बिहार सरकार की ओर से पेश वकील के एफआईआर में पाक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज होने का हवाला देते हुए इसे सुधारकर धारा 377 शामिल कराने की बात कही गई। इस पर भी पीठ सख्त नाराज दिखी। पीठ ने कहा, यदि एक आदमी मर जाता है और एफआईआर कहती है कि वह सामान्य घायल है तो आप क्या सोचते हैं कि हम यह बात स्वीकार करेंगे?
पीठ ने कहा कि आखिर आपने गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा क्यों नहीं दर्ज किया? वास्तव में पुलिस शुरुआत गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करती है और जांच के क्रम में पर्याप्त साक्ष्य न होने पर गंभीर धाराओं को हटाया जाता है, लेकिन बिहार में ठीक विपरीत प्रक्रिया चल रही है। पीठ ने राज्य सरकार को एक दिन में एफआईआर में सुधार करते हुए बुधवार को इसकी जानकारी देने के लिए कहा।
सुप्रीमकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, 'आखिर बिहार सरकार क्या कर रही है। यह शर्मनाक है। बच्चे के साथ कुकर्म हो रहा है और आप कह रहे हैं कि यह कुछ भी नहीं है। आखिर आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? यह अमानवीय है। हमें कहा गया कि इन मामलों को गंभीरता से लिया जा रहा है। क्या यहीं गंभीरता है? कुल 9 शेल्टर होम के मामले थे। आपने 5 मामलों में एफआईआर कराई और 4 को छोड़ दिया, क्यों? यह गुप्त रहस्य है।'
वहीं जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा, 'मैं जितनी बार भी इस मामले की फाइल पढ़ता हूं, उतनी ही बात इस मामले की त्रासदी से हिल जाता हूं। यह बेहद दुखद है। हमारा विचार है कि राज्य पुलिस ने अपना काम वैसे नहीं किया, जैसे कि अपेक्षा थी।'