Bihar Politics: नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव(फाइल)
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अगले 48 घंटे बहुत अहम
बिहार की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुमित कुमार कहते हैं कि यह बात तो सच है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस तरीके से लालू यादव से मिलकर उन्हें और उनके परिवार समेत पार्टी को आत्मीय बल दिया, उससे राजनैतिक गलियारों में तमाम तरीके की चर्चाओं का बाजार तो गर्म होने लग गया था। उनका कहना है निश्चित तौर पर जेडीयू और आरजेडी के बीच बीते कुछ दिनों में जो नज़दीकियां बढ़ी हैं वह बिहार में आज के बदले समीकरण में एक नई कहानी कह रही हैं। सुमित कहते हैं कि बिहार की राजनीति में अगले 48 घंटे बहुत अहम माने जा रहे हैं। क्योंकि जेडीयू और आरजेडी अपने विधायकों की सांसदों की बैठक कर रहा है। निश्चित तौर पर अचानक बुलाई गई इन बैठकों में बिहार बिहार को लेकर कोई बड़ा राजनीतिक उठापटक वाला फैसला भी हो सकता है।
कहने को तो नीतीश कुमार और भाजपा नेताओं के बीच में मतभेद लगातार बने हुए थे। कई बड़े मौकों पर यह न सिर्फ खुलकर सामने आए बल्कि इसी वजह से तमाम तरीके की राजनीतिक चर्चाओं को भी बल मिलने लगा। बावजूद इसके दो साल साल से ज्यादा से भाजपा और जेडीयू की सरकार बिहार में बनी हुई है। लेकिन पिछले कुछ समय से यह तल्खी ज्यादा बढ़ गई है। बिहार के राजनीतिक विश्लेषण अनिमेष रंजन कहते हैं कि यह तल्खी सबसे ज्यादा तब बढ़ी जब आरसीपी सिंह को पार्टी ने किनारे करना शुरू किया। वह कहते हैं कि जेडीयू, भाजपा से पहले से इस बात से नाराज थी कि चिराग मॉडल से उनका बड़ा नुकसान हुआ था। अब आरसीपी मॉडल से पार्टी को भितरघाती तौर पर बड़ा नुकसान पहुंचाने की तैयारी चल रही थी। बिहार के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2020 के चुनावों में जेडीयू पहले से ही वहां पर राष्ट्रीय जनता दल और भारतीय जनता पार्टी की तुलना में बहुत कम सीटों पर विजयी हुई थी। ऐसे में पार्टी को इस बात का अंदाजा था कि अगर आरसीपी मॉडल सक्रिय हो गया, तो आने वाले विधानसभा के चुनावों से लेकर लोकसभा के चुनावों में पार्टी के नीचे जमीन खिसक सकती है। यही वजह है कि जेडीयू ने अपना भविष्य देखते हुए बिहार में विकल्प तलाशने शुरू कर दिए।