बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी लोहियावादी विचारधारा की असली समाजवादी पार्टी बन चुकी है, जो समाज के हर पिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने और सरकार के माध्यम से उसका विकास करने में विश्वास रखती है। केंद्र-राज्यों की लोकहितकारी योजनाओं के जरिए समाज के सभी वर्गों तक पहुंचकर पार्टी ने यही संदेश मजबूती के साथ देने का काम किया है। पार्टी की यह सोच केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल से लेकर यूपी-एमपी और महाराष्ट्र सरकारों के मंत्रिमंडल में भी दिखाई पड़ी है। लोकसभा चुनाव 2019 और यूपी विधानसभा चुनाव 2022 ने यह प्रमाणित भी कर दिया है कि जनता भाजपा के दावों से काफी हद तक सहमति रखती है।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या नीतीश कुमार केवल जातीय गठजोड़ की राजनीति के सहारे 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राह में बड़ा रोड़ा पैदा कर पाएंगे? नीतीश कुमार ने 2024 में विपक्ष की राजनीति को नेतृत्व करने के संकेत दे ही दिए हैं, बिहार के नवनियुक्त मंत्री भी अभी से 2024 पर निशाना लगाते हुए देखे जा रहे हैं।
बिहार में 20 सीटों पर कड़ी टक्कर
राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने अमर उजाला से कहा कि बिहार की राजनीति पूरे देश से अलग है। पूरे देश की राजनीति मंडल युग से आगे निकल चुकी है, लेकिन बिहार अभी भी मंडलवादी जातीय राजनीति में बुरी तरह उलझा हुआ है। यहां एक-एक जातियों के अलग-अलग नेता हैं और मोदी-नीतीश जैसे बड़े कद के नेताओं के होने के बाद भी जातीय राजनीति के बल पर मजबूती से अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए हुए हैं।
बिहार में भाजपा के कोर वोटर (ब्राह्मण, राजपूत, बनिया, श्रीवास्तव) कुल मिलाकर भी 25 प्रतिशत वोट बैंक नहीं बनाते हैं, जबकि इसी दौरान राज्य में पूरा विपक्ष एकजुट होता दिख रहा है, लिहाजा माना जा सकता है कि यहां उसे (बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए) लगभग 20 लोकसभा सीटों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। यदि चिराग पासवान एनडीए खेमे में वापसी कर लेते हैं तो भी भाजपा इस नुकसान की बहुत ज्यादा भरपाई करने में सफल नहीं रहेगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के करिश्मे के दम पर भाजपा ने 22 सीटों पर सफलता प्राप्त की थी। उस चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान एनडीए खेमे में थे और क्रमशः तीन और छह सीटें जीतने में कामयाब रहे थे।
देश में परेशानी नहीं
लेकिन, भाजपा के सामने यह चुनौती केवल बिहार तक समिटती दिख रही है। बिहार के बाहर किसी दूसरे राज्य में मतदाता इस हद तक जातीय आधार पर बंटे हुए नहीं हैं। 80 लोकसभा सीटों वाले यूपी में ही भाजपा ने 2014 से लेकर अब तक लगातार अपना शानदार प्रदर्शन बकररार रखा है और बहुत हद तक जातीय आधार पर राजनीति करने वाली सपा-बसपा को किनारे लगाने में सफलता पाई है। इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि नीतीश कुमार के विपक्ष के सर्वमान्य नेता बनने पर भी इन समीकरणों में कोई बहुत ज्यादा बदलाव आएगा।
इसी प्रकार देश के दूसरे राज्यों पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम, महाराष्ट्र, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु या अन्य राज्यों में लगभग वही चुनावी परिस्थितियां मौजूद रहने के आसार हैं जिनसे भाजपा ने 2014 या 2019 में सामना किया था। नीतीश के साथ आने से चुनाव में आभासी तौर पर एकजुटता का संदेश तो अवश्य जा सकता है, लेकिन राज्यवार विचार करें तो इससे कोई भी दल अपना वोट बैंक किसी दूसरी पार्टी को ट्रांसफर करने की स्थिति में नहीं होगा।
इसी दौरान केंद्र सरकार ने समाज के अलग-अलग तबकों को मंत्रिमंडल और भाजपा ने संगठन में आगे बढ़ाकर उनका भरोसा जीतने की कोशिश की है। यह कोशिश भाजपा शासित हर राज्य की सरकारों और संगठन में किया जा रहा है जिसका लाभ पार्टी को मिल सकता है। केंद्र की योजनाओं के जरिए भी भाजपा ने कई वर्गों में अपनी पैठ मजबूत बनाने का काम किया है। लिहाजा, इस नए संभावित गठजोड़ से 2024 में नरेंद्र मोदी के सामने कोई बड़ी चुनौती पेश होती नहीं दिखती।