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बांकीपुर हार: अगड़ों  के तेवर से भाजपा सकते में, सुधार पर मंथन; ओबीसी-अगड़ा वोटरों के बीच संतुलन बनाना चुनौती

सार

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भाजपा ने राज्य इकाई से रिपोर्ट मांगी है। पार्टी का मानना है कि अगड़ा वर्ग की नाराजगी और कुछ अन्य वर्गों के असंतोष का असर चुनाव नतीजों पर पड़ा। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा अगड़ा और ओबीसी वोटरों के बीच संतुलन बनाने की रणनीति पर मंथन कर रही है।
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भाजपा की गलतियां भी पड़ीं भारी। - फोटो : amar ujala digital
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विस्तार
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बीते लोकसभा चुनाव में ओबीसी वर्ग से मिले झटके को संभालने में जुटी भाजपा अब बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में अगड़ा वर्ग से मिले नाराजगी भरे संदेश के बाद सकते में है। अगड़ों की नाराजगी के कारण राज्य की सबसे सुरक्षित सीट गंवाने के बाद पार्टी ने फौरी तौर पर राज्य इकाई से हार के कारणों पर रिपोर्ट तलब की है। पार्टी नेताओं का मानना है कि शिक्षण संस्थाओं में एससी, एसटी, ओबीसी छात्रों को भेदभाव से बचाने के लिए यूजीसी द्वारा जारी गाइड लाइन से इस वर्ग में उपजी नाराजगी उपचुनाव में सुनामी में बदल गई।

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दरअसल अति शहरी और अगड़ा प्रभाव वाली बांकीपुर ऐसी सीट है जो जनसंघ के जमाने से पार्टी की पहचान रही है। इस सीट पर भाजपा के कोर वोट बैंक माने जाने वाले कायस्थ, ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य के साथ कुर्मी-कोइरी की आबादी करीब 50 फीसदी है। फिर इस सीट पर चुनाव जीतने वाले प्रशांत किशोर ब्राह्मण बिरादरी के हैं जो भाजपा के अगड़ा वोट बैंक के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। दरअसल 2024 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश, हरियाणा में ओबीसी वर्ग के बड़े और बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान समेत कुछ दूसरे राज्यों में इस वर्ग से मिले आंशिक झटके के कारण पार्टी बहुमत से चूक गई थी। बाद में पार्टी ने इस वर्ग को साधने की मुहिम चलाई। इसके कारण पार्टी को हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार विधानसभा चुनाव में सफलता मिली।

पार्टी की बढ़ी चिंता
इस उपचुनाव में भाजपा को अपने मूल आधार अगड़ा वोट बैंक के खिसकने के साथ नीतीश कुमार के सीएम पद से हटने के कारण कुर्मी-कोइरी वोट बैंक में भी नाराजगी का संदेश मिला है। इसके अलावा जनादेश में पार्टी के मुखर समर्थक रहे जेन जी में पार्टी के प्रति उदासीनता का भाव सामने आया है। चूंकि भाजपा को नए साल की शुरुआत में ही यूपी, उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का सामना करना है, ऐसे में पार्टी के पास हालात संभालने के लिए बेहद कम समय हैं।

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