सीट का समीकरण: ट्रेन के एक सफर के चलते डीएसपी की जगह नेता बने रामविलास, अलौली ने पासवान को ऐसे बनाया ‘पारस’
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: संध्या कुमारी
Updated Fri, 11 Apr 2025 11:34 AM IST
सार
कभी कांग्रेस का गढ़ रही अलौली विधानसभा सीट कैसे धीरे-धीरे रामविलास पासवान और फिर उनके भाई पशुपति पारस का गढ़ बन गई? बाद में लोजपा ने कैसे यह सीट गंवा दी? मौजूदा समय में इस सीट पर क्या समीकरण हैं? आइये जानते हैं...
बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने है। सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट चुकी हैं। इस चुनावी साल में अमर उजाला बिहार और बिहार की राजनीति, उससे जुड़ी घटनाओं और चेहरों के बारे में अलग-अलग सीरीज के जरिए बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज की चौथी कड़ी में आज हम आपको अलौली विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। इस सीट पर सबसे बड़ा चेहरा रामविलास पासवान रहे थे। इसके बाद उनके भाई पशुपति कुमार पारस ने इस सीट पर सात बार जीत दर्ज की।
अलौली विधानसभा सीट रह चुकी है पासवान परिवार का गढ़।
- फोटो : अमर उजाला
बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने है। सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट चुकी हैं। इस चुनावी साल में अमर उजाला बिहार और बिहार की राजनीति, उससे जुड़ी घटनाओं और चेहरों के बारे में अलग-अलग सीरीज के जरिए बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज की चौथी कड़ी में आज हम आपको अलौली विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। इस सीट पर सबसे बड़ा चेहरा रामविलास पासवान रहे थे। इसके बाद उनके भाई पशुपति कुमार पारस ने इस सीट पर सात बार जीत दर्ज की।
1962: अस्तित्व में आई सीट
अलौली सीट पर सबसे पहले चुनाव 1962 में हुए थे। इस चुनाव में कांग्रेस ने यहां से जीत दर्ज की। कांग्रेस के मिश्री सदा ने स्वतंत्र पार्टी के धनपत दास को 14,443 वोट से हराया था। बाकी दो उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।
1967 के विधानसभा चुनाव में अलौली सीट पर फिर से कांग्रेस के मिश्री सदा को ही जीत मिली। इस चुनाव में मिश्री सदा ने निर्दलीय उम्मीदवार एस. दास को 10,378 वोट से हरा दिया था। इस बार कुल तीन उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे।
1969: जब पहली बार बिहार में हुए मध्यावधि चुनाव
1967 के विधानसभा चुनाव के साथ बिहार मे बहुत कुछ बदल चुका था। कांग्रेस बहुमत से दूर रह गई। महज 13 सीट जीतने वाली जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बने। उन्हें समर्थन मिला संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी यानी संसोपा समेत दूसरे दलों का, पर ये सरकार एक साल भी नहीं पूरे कर सकी। बगावत हुई, बगावत का चेहरा पहली बार जीता एक विधायक बना। सिर्फ चेहरा ही नहीं मुख्यमंत्री भी बना। पांच दिन बाद ही उस चेहरे सतीश प्रसाद सिंह ने अपने गुरु बीपी मंडल के लिए कुर्सी छोड़ दी। मंडल खुद मुख्यमंत्री बने पर दो महीने भी पद पर नहीं रह सके। मंडल के बाद भोला पासवान शास्त्री ने कुर्सी संभाली पर सौ दिन के भीतर उन्हें भी पद छोड़ना पड़ा।
इसके बाद 1969 में राज्य में नए सिरे से चुनाव हुए। चुनाव अलौली में भी हुए। अलौली में एक नए नेता की एंट्री हुई। वो नेता जो आगे चलकर देश की राजनीति में बहुत बड़ा चेहरा बना। वो नेता जिसने पूरे अलौली में साइकिल से घूम-घूमकर प्रचार किया। वो चेहरा जिसने नेता बनने के लिए नई-नई मिली डीएसपी की नौकरी छोड़ दी। कहते हैं उन्हें टिकट इसलिए मिला क्योंकि अलौली में लगातार दो बार जीत चुके मिश्री सदा के खिलाफ संसोपा से चुनाव लड़ने का कोई दूसरा दावेदार नहीं था। शहरबन्नी गांव से आने वाले इस चेहरे का नाम रामविलास पासवान था।
1969 के चुनाव में अलौली सीट से कुल पांच उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे, जिसमें से 45.29% वोट अकेले राम विलास को मिले थे।
1972: दूसरा चुनाव हारे रामविलास
रामविलास पासवान ने जितनी अच्छी जीत पिछले चुनाव में दर्ज की थी उतनी ही बुरी हार 1972 के चुनाव में रामविलास को मिली। 1972 के चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के रामविलास पासवान को कांग्रेस के मिश्री सदा ने हरा दिया और अपनी सीट पर फिर से कब्जा कर लिया। कांग्रेस के मिश्री सदा ने राम विलास को इस चुनाव में 6,807 वोट से हराया।
1977: पशुपति कुमार पारस की जीत का सिलसिला शुरू
1977 में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान हाजीपुर लोकसभा सीट से जीतकर सांसद बन गए। इसके बाद राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में अलौली सीट से जनता पार्टी ने रामविलास के भाई पशुपति पारस को टिकट दिया। पशुपति इस सीट पर चुनाव लड़े और जीते भी। जनता पार्टी के टिकट पर उतरे पशुपति कुमार पारस ने कांग्रेस के मिश्री सदा को 3,607 वोट से हरा दिया।
1980: पशुपति को मिली हार
1980 में जनता पार्टी (सेक्युलर) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे पशुपति कुमार पारस को हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस (आई) के मिश्री सदा से वापस इस सीट पर कब्जा किया और पशुपति पारस को 9,440 वोट से हरा दिया। अलौली सीट पर यह मिश्री सदा की चौथी जीत थी।
अलौली से लगातार छह चुनाव जीते पारस
1985 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर पशुपति पारस ने अलौली सीट पर जीत दर्ज की। लोकदल के टिकट पर उतरे पशुपति पारस ने कांग्रेस के वागेश्वर पासवान को 21,699 वोट से हरा दिया। इसके बाद 1990, 1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में भी अलौली सीट से पशुपति पारस ही जीतते रहे। हालांकि, इस दौरान भाई रामविलास के साथ उनकी पार्टियां बदलती रहीं। 1990 में जनता दल के टिकट पर उतरे पशुपति पारस ने कांग्रेस के अरुण कुमार पासवान को 28,191 वोट से हराया।
1995 में जनता दल के टिकट पर उतरे पशुपति कुमार पारस ने कांग्रेस के मिश्री सदा को 17,357 वोट से हराया। 2000 में जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर उतरे पशुपति पारस ने राजद के राम बृक्ष सदा को 4,686 वोट से हराया। फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में लोजपा से चुनाव लड़े पशुपति कुमार पारस ने राजद की मीरा देवी को 9,711 वोट से हराया। इसी तरह अक्टूबर 2005 के विधानसभा में लोजपा के पशुपति कुमार पारस ने राजद के रामबृक्ष सदा को 8,577 वोट से हराया था।
2010: पशुपति पारस को मिली हार
2010 के विधानसभा चुनाव में अलौली सीट पर पशुपति पारस को हार का सामना करना पड़ा। पारस को जदयू के रामचंद्र सदा ने 17,523 वोट से हरा दिया।
2015 के विधानसभा चुनाव में भी यहां से पारस एक बार फिर हार गए। उन्हें राजद के चंदन कुमार 24,470 वोट से मात दी। चंदन कुमार को 70,519 वोट मिले। वहीं, पशुपति पारस को 46,049 वोट से संतोष करना पड़ा।
2020 के विधानसभा चुनाव में अलौली सीट से राजद के रामवृक्ष सदा को जीत मिली। रामवृक्ष सदा ने जदयू की साधना देवी को 2,773 वोट से हराया। इस चुनाव में लोजपा तीसरे नंबर पर रही। 2010 में यहां से जीते रामचंद्र सदा इस चुनाव में लोजपा के टिकट पर उतरे थे।