मुआवजे जो सिर्फ वादे बनकर रह गए:
दुर्भाग्यवश, इतने सालों में घटना को हर बार बरसी के याद कर लिया जाता है, दोषी को सजा दिलाने और अतिरिक्त मुआवजा दिलाने के तमाम वादे किए जाते हैं। लेकिन दिन गुजरते ही वादों को घटना की तरह दफन कर दिया जाता है।
चूंकि, यूनियन कार्बाइड कारखाने का मालिकाना अधिकार अमेरिका की कंपनी के पास होने के कारण हमेशा यह मांग उठती रही है कि गैस पीड़ितों को मुआवजे की मांग डॉलर के वर्तमान मूल्य पर की जाना चाहिए। हालांकि, इस याचिका में दिए गए निर्देश अभी भी सरकारी फाइलों में ही बंद हैं।
इसके लिए वर्ष 2010 में एक पिटिशन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गयी थी। इस पीटिशन में 7728 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग की गई थी। कंपनी से वर्ष 1989 में जो समझौता हुआ था, उसके तहत 705 करोड़ रुपए मिले हैं। सरकार का तर्क है कि गैस कांड से प्रभावित और मृतकों की संख्या बढ़ी है, इस कारण मुआवजा भी बढ़ाना चाहिए।