गैस का रिसाव
यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से करीब 40 टन गैस का रिसाव हुआ था। इसकी वजह थी टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का पानी से मिल जाना। इससे हुई रासायनिक प्रक्रिया की वजह से टैंक में दबाव पैदा हो गया और टैंक खुल गया और उससे रिसी गैस ने हजारों लोगों की जान ले ली।
सबसे बुरी तरह कारखाने के पास स्थित झुग्गी बस्ती प्रभावित हुई। वहां हादसे का शिकार हुए वे लोग जो रोजीरोटी की तलाश में दूर-दूर के गांवों से आ कर वहां रह रहे थे। अधिकांश व्यक्ति निंद्रावस्था में ही मौत का शिकार बने। लोगों को मौत की नींद सुलाने में विषैली गैस को औसत तीन मिनट लगे।
ऐसे किसी हादसे के लिए कोई तैयार नहीं था। यहां तक कि कारखाने का अलार्म सिस्टम भी घंटों तक बेअसर रहा, जबकि उसे बिना किसी देरी के चेतावनी देना था। हांफते और आंखों में जलन लिए जब प्रभावित लोग अस्पताल पहुंचे तो ऐसी स्थिति में उनका क्या इलाज किया जाना चाहिए, ये डॉक्टरों को मालूम ही नहीं था।
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डॉक्टरों की मुश्किलें
शहर के दो अस्पतालों में इलाज के लिए आए लोगों के लिए जगह नहीं थी। वहां आए लोगों में कुछ अस्थाई अंधेपन का शिकार थे, कुछ का सिर चकरा रहा था और सांंस की तकलीफ तो सबको थी। एक अनुमान के अनुसार पहले दो दिनों में करीब 50 हजार लोगों का इलाज किया गया।
शुरू में डॉक्टरों को ठीक से पता नहीं था कि क्या किया जाए क्योंकि उन्हें मिथाइल आइसोसाइनेट गैस से पीड़ित लोगों के इलाज का कोई अनुभव नहीं था। हालांकि गैस रिसाव के आठ घंटे बाद भोपाल को जहरीली गैसों के असर से मुक्त मान लिया गया था। लेकिन 1984 में हुए इस हादसे से अब भी यह शहर उबर नहीं पाया है।
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