भारतीय राजनीति में न तो लालकृष्ण आडवाणी होना आसान है और न ही उनकी तरह सियासी हैसियत हासिल करना। पार्टी के लिए त्याग, परिवार और भ्रष्टाचार से दूरी को मंत्र बना कर उन्होंने राजनीति में अलग पहचान बनाई। पार्टी और विचारधारा के लिए सारा जीवन झोंक दिया। जीवनपर्यंत पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता रहे और हमेशा खुद की जगह पार्टी को तरजीह दी। आतंकवाद, तुष्टीकरण के खिलाफ उनका रुख वर्तमान पीएम मोदी की तरह ही रहा। अपनी सात दशक की राजनीतिक यात्रा में आडवाणी हमेशा परिवारवाद, भ्रष्टाचार से दूर रहे। जब भी त्याग करने का मौका आया तो खुद पहल की। राजनीति में विचारधारा और ठोस नीति अपनाने वाले आडवाणी विरले नेता रहे हैं। अपने इन्हीं गुणों, नेतृत्व और संगठन क्षमता की खूबियों के सहारे आडवाणी ने अछूत मानी जाने वाली भाजपा को साल 2000 तक कांग्रेस की जगह राजनीति के केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया था।
हमेशा पार्टी हित को तरजीह
आडवाणी के लिए हमेशा पार्टी और विचारधारा प्राथमिकता रही। रामलहर में बड़ा कद होने के बावजूद पार्टी के भले के लिए हमेशा वाजपेयी को नेता माना। जब पहली बार वाजपेयी की अगुवाई में सरकार बनी तो पार्टी हित में संगठन को तरजीह दी और तब नंबर दो की हैसियत से डॉ जोशी ने शपथ ली।
स्वीकार की अखंड हिंदुत्व की चुनौती
मंडल आयोग की रिपोर्ट को संघ के अखंड हिंदुत्व के लिए चुनौती माना गया। इसके असर को कम करने की चुनौती आडवाणी ने स्वीकार की। इसके बाद रथ यात्रा के सहारे आडवाणी ने मंडल बनाम कमंडल की चर्चा को राजनीति में स्थापित किया।
तुष्टीकरण और आतंकवाद के खिलाफ आडवाणी का बेहद सख्त रुख रहा...
गृह मंत्री बनने के बाद उन्होंने विपक्ष के तमाम विरोध के बावजूद आतंकी संगठन सिमी पर प्रतिबंध लगाया। आतंकवाद विरोधी पोटा कानून के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई।
महज आरोप लगने के बाद ही इस्तीफा
आडवाणी छह दशक से अधिक समय तक सार्वजनिक जीवन में रहे। जनता पार्टी सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बने। राजग सरकार में गृह मंत्री और फिर उपप्रधानमंत्री रहे। उनका दामन बेदाग रहा। 1996 में हवाला कांड में आरोप लगते ही उन्होंने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। जांच में उन्हें निर्दोष पाया गया।
- आडवाणी पुस्तक, सिनेमा व चॉकलेट के शौकीन हैं। शुरुआती दौर में पत्रकार रहे। ऑर्गेनाइजर अखबार के सहायक संपादक भी रहे।
- ऑर्गेनाइजर में यह लिख कर सनसनी फैला दी कि पीएम रहते लालबहादुर शास्त्री तत्कालीन संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर से सलाह लेते थे।
- आडवाणी 1970 से 2019 तक लगातार संसद सदस्य रहे। 1984 में हार के दो साल बाद वह उच्च सदन में रहे। हवाला मामले में बरी होने के बाद फिर चुनाव जीते।