कांग्रेस पार्टी की 'भारत जोड़ो यात्रा' शुरू हो चुकी है। इस यात्रा की सफलता, यानी कांग्रेस पार्टी को इसका कितना फायदा मिलेगा, इस बाबत कयास लगाए जा रहे हैं। सवाल ये भी उठता है कि 'भारत जोड़ो यात्रा' से क्या दस्तूर बदलेगा। क्या राजनीतिक दलों और आम जनता के बीच की दूरी कम हो पाएगी। यात्रा में एक नई बात देखने को मिली है, वह है सिविल सोसायटी के करीब दो सौ सदस्यों द्वारा इस यात्रा को समर्थन देना। अभी तक ये सदस्य, जनहित के विभिन्न मुद्दों पर केंद्र एवं राज्यों सरकारों के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। अब ऐसा क्या हो गया कि इन्हें 'सरकार के साथ, सरकार के खिलाफ', इन दो जमातों में से एक राह चुननी पड़ी। राजनीति एवं समाजशास्त्र के जानकार बताते हैं, एक 'डर' रहा है, जिसने सिविल सोसायटी को 'भारत जोड़ो यात्रा' के साथ खड़ा कर दिया।
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार, जिन्हें राजनीति एवं समाजशास्त्र का विशेषज्ञ कहा जाता है, उन्होंने 'मौजूदा परिस्थितियों' एवं 'भारत जोड़ो यात्रा' के संदर्भ में अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विस्तृत बातचीत की है। योगेंद्र यादव, पी राजुगोपाल, गणेश देवी और एसपी दुबे कुमार सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भारत जोड़ो यात्रा को समर्थन दे दिया है। सिविल सोसायटी के अनेक सदस्य, यात्रा में शामिल भी हो रहे हैं। प्रो. आनंद कुमार बताते हैं, समाजशास्त्र में राजनीतिक, सत्ता और आर्थिक तत्व जुड़े रहते हैं। लोगों को उम्मीद रहती है कि राजनीतिक दल तो फुल टाइम व्यवसाय की भांति हैं, वे लोगों को जागरूक करते हैं, उन्हें बदलाव की राह पर ले जाते हैं। अब दो दशकों से राजनीति में एक दोष आ गया है। देश में राजनीतिक लोगों का एक अलग ही वर्ग बन गया है। उनकी अपनी जीवन शैली है और अपने ही नियम हैं। 1967 तक राजनीति का आधार 'सेवा' होता था। उसी मंत्र पर राजनीतिक दल और उनके नेता आगे बढ़ते थे। अब वह मंत्र बदल चुका है। उसकी जगह अब पैसे ने ले ली है।
राजनीति में अब पूरी तरह पैसे का बोलबाला है। पहले टिकट के लिए पैसा दो, फिर चुनाव में पैसा खर्च करो। कई जगहों पर वोटों के लिए पैसा देने के आरोप लगते रहे हैं। राजनेताओं के इस नए वर्ग ने जनसाधारण से दूरी बना ली है। पार्टी दफ्तर, अब घरों से चलने लगे हैं। एक नई संस्कृति, जिसे सत्ता संस्कृति कहा जाता है, आ चुकी है। इस नई संस्कृति में नागरिकों के लिए सरकार की आलोचना करना, एक जोखिम सा बनता जा रहा है। देश में दो ही जमात नजर आती हैं। उसमें आप 'सरकार के साथ हैं या खिलाफ हैं' इन्हीं में एक विकल्प चुनना है। दिक्कत ये है कि आम नागरिक, इनमें से किसी के साथ नहीं रहना चाहता। अगर वह बोलता है, तो उसे परेशानी झेलनी पड़ती है। अपने विरोधियों को पछाड़ने के लिए, ऐसे कदम जो पहले राजनीति में स्वीकार्य नहीं होते थे, आज चारों तरफ वही दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के शासन में भी ऐसा हुआ था। जवाहर लाल नेहरू ने कम्युनिस्टों को शांत कराने का प्रयास किया तो इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में उन्हें बंद कर दिया था।
बतौर डॉ. आनंद कुमार, मौजूदा सरकार में तो सारी हदें ही पार हो गई हैं। जो लोग राजनीति व समाज में सुधार करना चाहते हैं, उन्हें बंद कर रही है। राजनीति में जो एक 'निर्दलीय' क्षेत्र का भाव रहता था, वह अब खत्म हो चला है। आपको या तो साथ रहना है या खिलाफ। यही वजह है कि राजनीतिक प्रबंधन के आलोचकों को अब राजनीतिक दलों की शरण लेनी पड़ रही है। पिछले 30 वर्ष में नेता, राजनीति के व्यवसायीकरण का शिकार हुए हैं। उन्हें बस राजनीति का आर्थिक आधार व वोट बैंक ही दिखाई पड़ता है। इन दलों ने नागरिक समाज से रिश्ता खत्म कर लिया है। ऐसे में सिविल सोसायटी के सदस्य या दूसरे संगठन अकेले पड़ रहे हैं। राजनीतिक दल अपने उस दोष के शिकार हैं, जिसमें वे वोट बैंक के बाहर कुछ देखना ही नहीं चाहते। राजनेताओं को जहां वोट दिखता है, वे उसी विषय में रूचि लेते हैं। नतीजा, आज राजनीतिक दलों को पुर्नजीवित करना पड़ रहा है। पहले, जीत गए तो सत्ता मिलती है, यह धारणा रहती थी। भाजपा ने उसे बदल दिया है। सत्ताधारी दल को परेशान करना शुरु कर दो, सरकार गिराने की कोशिश करना, ये सब आरंभ हो गया है। क्षेत्रीय दलों के साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है। विरोधी दलों को सबक सिखाने के नए रास्ते खोजने पड़ रहे हैं।