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भदोही: कालीन उद्योग को पाकिस्तान से मिल रही कड़ी चुनौती, 20 लाख लोगों के रोजगार के इस मुद्दे को कैसे सुलझाएगी सरकार

सार

हाल के वर्षों में विदेशों से कालीन उद्योग को मिलने वाली चुनौती बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि पाकिस्तान की मुद्रा में तेज अवमूल्यन हुआ है जिससे उसके उत्पाद सस्ते हो गए हैं। आरोप है कि ईरान जैसे देश पाकिस्तान के बाजारों के जरिए अपना माल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच रहे हैं क्योंकि उन पर कई तरह के व्यापारिक प्रतिबंध लगाए गए हैं। 
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टेक्सटिको के चेयरमैन इम्तियाज अहमद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कालीन उद्योग भदोही, मिर्जापुर, वारणसी और आसपास के क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 1200 से अधिक रजिस्टर्ड कम्पनियां कालीन बनाने और एक्सपोर्ट करने के काम में लगी हुई हैं। इससे अकेले इस क्षेत्र के दो लाख से ज्यादा कारीगरों और उनके लगभग 10 लाख परिवारों की जिंदगी जुड़ी हुई है। देश में 20 लाख से ज्यादा लोग कालीन उद्योग में सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कारणों से इस उद्योग के सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो गई है जिसका समय पर निराकरण करना बेहद आवश्यक है अन्यथा यह 20 लाख से ज्यादा परिवारों की जिंदगी में बड़ा संकट बनकर सामने आ सकता है।
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दरअसल, भारत के कालीन उद्योग को पाकिस्तान और टर्की जैसे देशों से कड़ी चुनौती मिल रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पाकिस्तान के ठंडे क्षेत्रों में पैदा होने वाला ऊन ज्यादा बेहतर क्वालिटी का और सस्ता होता है। पाकिस्तान में श्रम भी सस्ती कीमत पर उपलब्ध है। जबकि हमारे व्यापारियों को ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अन्य देशों से ऊन का आयात करना पड़ता है जो भारतीय उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी महंगा बना देता है। 

कारपेट पैलेस के चेयरमैन भारत लाल मौर्या ने अमर उजाला को बताया कि पाकिस्तानी मुद्रा सस्ती होने के कारण वे पाकिस्तानी व्यापारी हम से कम कीमत में माल बेच करके भी भारी मुनाफा कमाते हैं जबकि उसी कीमत पर बेचने पर हमें कोई विशेष लाभ नहीं होता। उन्होंने कहा कि सरकार ने कालीन उत्पादकों और  निर्यातकों को जीएसटी के जाल में उलझा रखा है जिसमें हमारे करोड़ों रुपए फंसे रहते हैं।  उत्पाद की बिक्री के लंबे समय के बाद यह टैक्स छूट के रूप में उन्हें वापस प्राप्त होता है लेकिन इसी दौरान बैंकों से लिया पैसा चुकाने में उन्हें भारी ब्याज चुकाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि बाद में छूट के रूप में वापस मिलने वाली सहायता राशि को सरकार शुरुआती दौर में ही माफ कर दे तो उससे इस उद्योग के लोगों को भारी राहत मिल सकती है। 
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हाल के वर्षों में विदेशों से कालीन उद्योग को मिलने वाली चुनौती बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि पाकिस्तान की मुद्रा में तेज अवमूल्यन हुआ है जिससे उसके उत्पाद सस्ते हो गए हैं। आरोप है कि ईरान जैसे देश पाकिस्तान के बाजारों के जरिए अपना माल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच रहे हैं क्योंकि उन पर कई तरह के व्यापारिक प्रतिबंध लगाए गए हैं। इससे भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाकिस्तान के जरिए पहुंचने वाला माल ज्यादा सस्ता हो गया है।

जीएसटी के कारण हो रही समस्या
वहीं भारत में जीएसटी जैसी कानूनों के कारण भारतीय व्यापारियों को अतिरिक्त समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है भारत में बच्चों को कालीन उद्योग में काम करने से रोकने से कंपनियों पर मजदूरी का भार बढ़ा है। 

चीन सहित दुनिया की अनेक देश पावरलूम की मशीनों पर बेहतर फर्निशिंग के कालीन तैयार कर रहे हैं। मशीनों से निर्मित होने के कारण इनकी लागत भी बहुत कम आ रही है जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर क्वालिटी के कालीन बेहद कम कीमतों पर उपलब्ध है।  जबकि हाथ से निर्मित भारतीय कालीन अपेक्षाकृत काफी महंगे हैं। भारत में भी अनेक कालीन निर्माता कंपनियां मशीनों से निर्माण करने लगी हैं जिससे इस क्षेत्र के हाथ के कालीन कारीगरों की रोजी-रोटी पर संकट गहराता जा रहा है। 

भरत लाल मौर्या ने कहा कि यदि सरकार इस उद्योग से जुड़े हुए लाखों लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाना चाहती है तू इसके लिए उद्योगों को जीएसटी जैसे कानूनी पचड़े में नहीं फसाना चाहिए।  उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में बहुत उज्जवल भविष्य ना होने के कारण गरीब मजदूर भी अपने बच्चों को हाथ से बनने वाले कालीन की कला सिखाने के लिए बहुत उत्सुक नहीं होते हैं जिससे आने वाले दिनों में इस क्षेत्र के सामने योग्य कारीगरों का बड़ा संकट उभर सकता है। 

यदि सरकार चाहती है कि हाथ से बनने वाले विशेष कालीन की यह कला मौजूद रहे और इसके जरिए लाखों लोगों को रोजगार मिलता रहे तो उसे इस क्षेत्र को विकसित करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 

कालीन उद्योग के कुछ जानकार पड़ोसी देशों और पावर लूम को भारतीय उद्योग के सामने बड़ी चुनौती नहीं मानते।, टेक्सटिको कंपनी के चेयरमैन इम्तियाज अहमद ने कहा कि हमारे कारीगरों के हाथ में बेहद उन्नत कला है और बेहद उम्दा रंग और डिजाइन के बने हमारे कारपेट अपनी तकनीकी के कारण पावर लूम की मशीनों पर बनने वाले कारपेट से बेहतर साबित होते हैं।  यही कारण है कि पश्चिम और अरब देशों में भारी मशीनीकरण होने के बाद भी भारत का कालीन उद्योग अभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती के साथ टिका हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार टेक्सटाइल इंडस्ट्री के कालीन उद्योग के लिए उचित नियमों का निर्माण करें और उसे निर्यात में प्रोत्साहन दे तो यह क्षेत्र मशीनीकरण की चुनौतिया से उभरते हुए भी पूरी दुनिया में सिरमौर बना रह सकता है। 

श्रमिक बना रहे कालीन से दूरी
हथकरघा मशीन पर कालीन बनाने वाले एक श्रमिक रतन लाल ने कहा कि वे बचपन में अपने दादा और पिता के साथ कालीन बनाने का हुनर को सीख चुके थे। अन्य कामकाज करने के बाद पूरा परिवार कालीन निर्माण का काम करता था। इससे पूरे परिवार को काम मिल जाता था और सबका खर्च भी चल जाता था। लेकिन अब पूरे परिवार के द्वारा दिन भर काम करने के बाद भी उनकी आय बेहद मामूली होती है जिससे गुजारा करना आज की महंगाई के जमाने में संभव नहीं है। वह कतई नहीं चाहेंगे कि उनकी आने वाली पीढ़ियां कालीन निर्माण के उद्योग में अपना भविष्य तलाशें। 

रतन लाल की परिवार की तरह हजारों परिवार हर साल अब कालीन से नाता तोड़ रहे है। कि बच्चे बेहतर भविष्य की आस में महानगरों की राह पकड़ रहे हैं और कृषि की तरह इस क्षेत्र में भी लोगों का तेज पलायन हो रहा है यदि सरकार ने समय रहते इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए उचित योजनाओं का निर्माण नहीं किया तो हथकरघा कला से कालीन बनाने का यह उद्योग भी अन्य हथकरघा उद्योगों की तरह निष्प्राण हो सकता है। 
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