बंगाल भाजपा महिला मोर्चा की प्रमुख अग्निमित्रा पॉल ने मतगणना के दिन अमर उजाला से कहा था कि तृणमूल से आए अधिकांश नेता चुनाव हार चुके हैं। भाजपा उपाध्यक्ष ने भी यही जानकारी दी थी। अब बताते हैं कि तृणमूल से भाजपा में आए नेताओं ने मनमाफिक तरीके से राज्य की 140 सीटों को चुन लिया था।
इनमें लोकसभा में जीती गई 18 सीटों के प्रभाव वाली 121 सीटें भी शामिल थी। भाजपा के पुराने नेताओं, कार्यकर्ताओं के जिम्मे मुश्किल वाली 152 सीटें आई। कुल 292 सीट पर चुनाव लड़ा गया। लेकिन नतीजा आया तो तृणमूल से आए नेता केवल आठ सीटें जीत सके। भाजपा के नेता, कार्यकर्ताओं ने 69 सीटें जीत लीं। सूत्र का कहना है कि केन्द्रीय नेतृत्व को इस बारे में सोचना चाहिए।
हार गए तो अब नैरटिव बदला जा रहा है
भाजपा के नेताओं का कहना है कि सितंबर-अक्टूबर 2020 तक हमें भरोसा था कि चुनाव बाद सरकार बना लेंगे। ममता बनर्जी और तृणमूल की पराजय तय है। इसी भरोसे से केन्द्रीय गृहमंत्री समेत सभी नेता 200 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रहे थे, लेकिन हम हार गए।
पहला कारण -तृणमूल से आए नेताओं को अधिक महत्व मिलने के कारण पुराने भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ी। वे घर बैठ गए या फिर केवल दिखावे के लिए निकले। तर्क है कि तृणमूल के जिन नेताओं से हमारे नेता पिटे, मार खाए, उनके पार्टी में आने के बाद झंडा कैसे उठाते?
दूसरा कारण-सोनार बांग्ला की बात करके भाजपा हिन्दी भाषी, उ.प्र. बिहार, दूसरे राज्य के नेताओं पर झुक गई। तृणमूल कांग्रेस ने बंगाली अस्मिता की राह पकड़ ली।
तीसरा कारण- 2016 के बाद से भाजपा ममता बनर्जी के राज से मुक्ति दिलाने की आवाज उठा रही थी, लेकिन उसके आरोपी, गुंडा छाप नेताओं के पार्टी में आने के बाद पार्टी विद डिफरेंस का मतलब ही खत्म हो गया। बंगाल के लोगों को लगा कि भाजपा दूसरा तृणमूल हो गई है। इसलिए सब ममता बनर्जी के साथ चले गए।
चौथा कारण- मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर तृणमूल के पास ममता बनर्जी का चेहरा था। भाजपा चेहरा घोषित करने से परहेज करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी।
अब देखिए आगे क्या होता है?
सूत्र का कहना है कि भाजपा विधायक दल का नेता चुनाव जाना है। अब देखना है कि शीर्ष नेतृत्व क्या रुख तय करता है। यहां सुवेन्दु अधिकारी होते हैं या कोई और? बताते हैं इसका असर पार्टी और संगठन दोनों पर पड़ेगा। सुवेन्दु अधिकारी अपने भविष्य को सुरक्षित करने में जुट गए हैं। इसी तरह से संगठन में भी तृणमूल से आए नेताओं को व्यवस्थित करने की होड़ मच सकती है। सभी की निगाह पश्चिम बंगाल की भावी भाजपा पर है।