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बंगाल हिंसा: तृणमूल से आए नेताओं को सुरक्षा, पुराने भाजपाइयों को डंडा भी नसीब नहीं 

Thu, 06 May 2021 10:30 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला नई दिल्ली

सार

140 पसंदीदा सीटों पर लड़कर केवल आठ सीटें जीते टीएमसी छोड़कर भाजपा में आए नेता, जबकि मूल रूप से भाजपा के नेता 152 सीटों पर लड़कर 69 जीते। 
 
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पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा - फोटो : PTI
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विस्तार
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यह खून-खराबा तो होना ही था। जब पेड़ बबूल का लगाएंगे तो उसमें आम का फल कहां मिलेगा? यह तर्क है पश्चिम बंगाल भाजपा के दो प्रदेश उपाध्यक्षों का। राज्य भाजपा की एक महिला नेता भी बहुत खफा हैं। फोन पर कहती हैं कि हम अपने नेताओं की करतूत से हारे। महिला नेता का कहना है कि तृणमूल से भाजपा में आया नेता बंदूक वाला सिक्योरिटी गार्ड लेकर घूमता है, जबकि हमें डंडा तक नसीब नहीं है। सूत्र का कहना है कि भाजपा के शीर्ष नेता ही अपने मूल नेताओं को नीचा दिखाने में लगे थे तो क्या होगा? जब आग हमने लगाई है तो घर हमारा भी जलेगा ही?

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पश्चिम बंगाल के कई भाजपा नेताओं का कहना है कि उन्हें पहले से राज्य में हिंसा भड़कने की स्थिति का अंदाजा था। वह कहते हैं कि बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई चीज नहीं है, लेकिन जिस तरह से चुनाव के दो महीने पहले से माहौल बनने लगा था, उससे यही उम्मीद थी। पार्टी के एक नेता कहते हैं कि कदाचित भाजपा जीतती तब भी कुछ बड़ा ही होता। यह बात अलग है कि चुनाव में तृणमूल जीत गई।

हमारी मलाई तृणमूल के अवसरवादी खा गए
जीवन के 33 साल भाजपा को दे चुके नेता की सुनिए। सूत्र का कहना है कि तीन दशक से अधिक समय के संघर्ष के बाद अब पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं के लिए चुनाव लडऩे का समय आया था। इसे तृणमूल से भाजपा में आए नेता ले उड़े। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष का कहना है कि एक अच्छा अवसर हाथ से निकल गया। 
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बताते हैं कि चुनाव से पहले पार्टी के शीर्ष पदाधिकारियों की बैठक हुई थी। इसमें भाजपा महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयावर्गीज और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष भी थे। प्रस्ताव रखा गया कि लोकसभा में भाजपा ने जिन 18 सीटों को जीता है, उसके दायरे में 121 सीटें आती हैं। यहां से भाजपा के मूल कार्यकर्ता और नेताओं को चुनाव लड़ाना चाहिए। सूत्र का कहना था कि इसे अच्छा प्रस्ताव माना गया, लेकिन बाद में चार्टर्ड प्लेन, पैराशूट से उतरे नेताओं के कारण सबकुछ बिगड़ गया। सूत्र का कहना है कि इसे केन्द्रीय नेतृत्व भी समझ रहा है, लेकिन यह मुद्दा अब उठाए कौन?
 

भाजपा के नेता, कार्यकर्ता जीते 69 और तृणमूल छाप भाजपाई केवल 8

बंगाल भाजपा महिला मोर्चा की प्रमुख अग्निमित्रा पॉल ने मतगणना के दिन अमर उजाला से कहा था कि तृणमूल से आए अधिकांश नेता चुनाव हार चुके हैं। भाजपा उपाध्यक्ष ने भी यही जानकारी दी थी। अब बताते हैं कि तृणमूल से भाजपा में आए नेताओं ने मनमाफिक तरीके से राज्य की 140 सीटों को चुन लिया था। 

इनमें लोकसभा में जीती गई 18 सीटों के प्रभाव वाली 121 सीटें भी शामिल थी। भाजपा के पुराने नेताओं, कार्यकर्ताओं के जिम्मे मुश्किल वाली 152 सीटें आई। कुल 292 सीट पर चुनाव लड़ा गया। लेकिन नतीजा आया तो तृणमूल से आए नेता केवल आठ सीटें जीत सके। भाजपा के नेता, कार्यकर्ताओं ने 69 सीटें जीत लीं। सूत्र का कहना है कि केन्द्रीय नेतृत्व को इस बारे में सोचना चाहिए।

हार गए तो अब नैरटिव  बदला जा रहा है
भाजपा के नेताओं का कहना है कि सितंबर-अक्टूबर 2020 तक हमें भरोसा था कि चुनाव बाद सरकार बना लेंगे। ममता बनर्जी और तृणमूल की पराजय तय है। इसी भरोसे से केन्द्रीय गृहमंत्री समेत सभी नेता 200 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रहे थे, लेकिन हम हार गए।
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हार के चार बड़े कारण

पहला कारण -तृणमूल से आए नेताओं को अधिक महत्व मिलने के कारण पुराने भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ी। वे घर बैठ गए या फिर केवल दिखावे के लिए निकले। तर्क है कि तृणमूल के जिन नेताओं से हमारे नेता पिटे, मार खाए, उनके पार्टी में आने के बाद झंडा कैसे उठाते?

दूसरा कारण-सोनार बांग्ला की बात करके भाजपा हिन्दी भाषी, उ.प्र. बिहार, दूसरे राज्य के नेताओं पर झुक गई। तृणमूल कांग्रेस ने बंगाली अस्मिता की राह पकड़ ली।

तीसरा कारण- 2016 के बाद से भाजपा ममता बनर्जी के राज से मुक्ति दिलाने की आवाज उठा रही थी, लेकिन उसके आरोपी, गुंडा छाप नेताओं के पार्टी में आने के बाद पार्टी विद डिफरेंस का मतलब ही खत्म हो गया। बंगाल के लोगों को लगा कि भाजपा दूसरा तृणमूल हो गई है। इसलिए सब ममता बनर्जी के साथ चले गए।  

चौथा कारण-  मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर तृणमूल के पास ममता बनर्जी का चेहरा था। भाजपा चेहरा घोषित करने से परहेज करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी।

अब देखिए आगे क्या होता है?
सूत्र का कहना है कि भाजपा विधायक दल का नेता चुनाव जाना है। अब देखना है कि शीर्ष नेतृत्व क्या रुख तय करता है। यहां सुवेन्दु अधिकारी होते हैं या कोई और? बताते हैं इसका असर पार्टी और संगठन दोनों पर पड़ेगा। सुवेन्दु अधिकारी अपने भविष्य को सुरक्षित करने में जुट गए हैं। इसी तरह से संगठन में भी तृणमूल से आए नेताओं को व्यवस्थित करने की होड़ मच सकती है। सभी की निगाह पश्चिम बंगाल की भावी भाजपा पर है।
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