एक साल बाद सरदार पटेल का निधन हो गया और वे गृहमंत्री बने। पर कुछ ही दिनों में वे कैबिनेट से अलग हो गए। 1952 में चुनाव हुआ और राजाजी बिना चुनाव लड़े तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। 1954 में पार्टी के कहने पर मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। अगले ही साल उन्हें ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। वे ये सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले पहले भारतीय थे।
राजाजी की रामकथा
राजाजी अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने वाल्मीकी ‘रामायण’ के आधार पर ‘दशरथनंदन श्रीराम’ नाम से रामकथा और ‘महाभारत’ लिखी जो साहित्य में मील का पत्थर है। इनके हिंदी अनुवाद भी हुए हैं।
राजाजी का कहना था, 'मैंने अपने लोगों की सबसे अच्छी सेवा रामायण और महाभारत को फिर से सुनाकर की। रामायण भारत के लिए मां का दूध है। इसे अपने आप पर छोड़ देना चाहिए न कि दार्शनिक पर। मां का दूध रासायनिक विश्लेषक के पास नहीं भेजा जाना चाहिए!' लेकिन हिंदुओं का एक तबका तब भी उनके सेक्युलरिज्म पर सवाल उठाता था।
अंतिम विदाई
नेहरू की मृत्यु के आठ साल बाद 26 दिसंबर 1972 को राजाजी भी 94 की उम्र में चल बसे। आजादी के योद्धाओं में वे सबसे ज्यादा समय तक जीवित रहने वाले व्यक्ति थे। शायद आजादी के बाद की सारी यातनाएं, दुख और तकलीफें उन्हीं के हिस्से में सबसे ज्यादा आनी थीं। वे अंत तक लड़ते रहे। ईश उपनिषद का ये श्लोक उन्हें बहुत पसंद था। जिसका अनुवाद कुछ इस तरह है-
शरीर राख में मिल जाएगा/ सांसें कभी न मरने वाली हवा में विलीन हो जाएंगी/पीछे केवल कर्म रह जाएगा/हे मन, इसे सदा याद रखना, याद रखना।
महात्मा गांधी की 'अंतरात्मा का रक्षक'
1900 में राजाजी बैरिस्टर बन गए। उन दिनों वे 'सीआर' के नाम से तेज तर्रार वकील के तौर पर जाने जाते थे। लेकिन उनका मन आजादी की लड़ाई के लिए बेचैन था। तिलक उनके हीरो थे। वे सीधी बात भी व्यंग्य में कहते थे। एक बार वे किसी अंग्रेज के साथ ट्रेन में सफर कर रहे थे। अंग्रेज ने कहा-बहुत गर्मी है। सीआर बोले-गर्मी है मगर इतनी ज्यादा नहीं। इस पर अंग्रेज ने कहा-मतलब. तो राजाजी का जवाब था-अभी देश में इतनी गर्मी नहीं है कि आप जैसे महाशय देश छोड़ कर चले जाएं। सीआर गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका के काम से बहुत प्रभावित थे।
मार्च 1919 में जब गांधीजी पहली दफा मद्रास आए तो सीआर उनके मेजबान की भूमिका में थे। लेकिन वो घर 'द हिंदू' के संपादक कस्तूरीरंगा आयंगर का था तो उन्हें पता ही नहीं चला कि असली मेजबान सीआर हैं। इस किस्से को खुद गांधी ने लिखा। सीआर तो दो दिन गांधी से मिलने तक नहीं आए। तब गांधीजी ने सचिव महादेव भाई ने बताया कि सीआर ही आपके असल मेजबान हैं तो उन्होंने सीआर को बुलवाया। उस दिन दोनों पहली दफा मिले और अगले दिन अखबार में खबर छपी कि रोलेट बिल गजट हो गया।
गांधीजी ने सीआर को फिर बुलाया और कहा-रात में मुझे सपना आया कि मैं इस बिल के विरोध में सारे देश में हड़ताल करूं। ये आत्मशुद्धि की धार्मिक लड़ाई है। इसलिए लड़ाई अहिंसक हो, देश की जनता शांति से कानून का विरोध करे। सभी लोग उपवास व रोजा रखें। कामकाज बंद रहे। ये राय राजाजी को पसंद आई। तुरंत नोटिस तैयार हुआ। पहले हड़ताल की तारीख 30 मार्च रखी गई बाद में ये 6 अप्रैल 1919 कर दी गई। यानी देश के पहले सबसे बड़े अंदोलन की सलाह बापू ने राजाजी से ली थी। 1919 के रोलेट एक्ट के विरोध में वे पहली बार कुछ महीने के लिए जेल भी गए। सीआर गांधीजी से केवल नौ साल छोटे थे इसलिए दोनों में बहुत जल्दी गहरी दोस्ती हो गई। 1930 के सत्याग्रह में उन्होंने पूरे दक्षिण भारत को आंदोलित किया, इसलिए कोई हैरत नहीं कि इतिहासकार एंटोनी कोपले ने उन्हें गांधी का दक्षिण का सेनापति नाम दिया।
नर्मदा नदी के किनारे त्रिपुरा कांग्रेस में पार्टी अध्यक्ष के लिए गांधीजी का पट्टाभि सीतारमैया को खुला समर्थन था। जबकि उनके खिलाफ सुभाषचंद्र बोस खड़े हो गए और चुनाव भी जीत गए। तब राजाजी ने अपनी चित परिचित व्यंग्य शैली में लिखा, जो हमेशा के लिए कुख्यात हो गया- नदी पर दो नावें हैं। एक पुरानी नाव है, लेकिन बड़ी नाव है, जिसकी पतवार महात्मा गांधी के हाथ में है। एक और आदमी के पास एक नई नाव है, जो बहुत आकर्षक ढंग से सजी-धजी है। महात्मा गांधी एक आजमाए हुए नाविक हैं जो आपको सुरक्षित रूप से किनारे ले जा सकते हैं। लेकिन दूसरी नाव में छेद है। वो आपको निश्चित डुबाेएगी क्योंकि नर्मदा बहुत गहरी है।
बापू आप गलत हो
पूरी कांग्रेस में राजाजी अकेले ऐसे कांग्रेसी थे जो गांधीजी को उनके किसी गलत फैसले पर कह सकते थे कि बापू आपका ये फैसला गलत है। ऐसा न करें। फिर वह कोई उनका निजी फैसला हो या राजनीतिक। राजाजी गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सख्त खिलाफ थे। सरला देवी को लेकर जब गांधीजी के घर में कलह शुरू हुई तो राजाजी ने ही गांधी को पत्र लिखकर समझाया कि वे गलत राह पर हैं। गांधीजी ने सरला से संबंध तोड़ दिए। शायद इसीलिए गांधी उन्हें 'मेरी अंतरात्मा का रक्षक' कहते थे। राजाजी ने गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का मुखर होकर विरोध किया।
उनका कहना था कि ये वक्त अंग्रेजों और मुसलमानों से समझौता कर उन्हें मनाने का है। लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। तब उन्हें कांग्रेसियों से खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी। मुंबई की एक सभा में उन पर चारकोल तक फेंका गया। गांधी ने इस घटना की तीखी निंदा की। आंदोलन में गांधी, नेहरू समेत सारे कांग्रेसी नेता जेल में ठूंस दिए गए। और अगले तीन साल के लिए आजाद जिन्ना को देश में जहर फैलाने का वक्त मिल गया। राजाजी, गांधी और कांग्रेस के रवैये से इतने दुखी हो गए कि उन्होंने 1942 में पार्टी की सदस्यता से ही इस्तीफा दे दिया।