मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व बसपा सुप्रीमो मायावती।
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यूपी में कितना फायदा
विश्लेषकों के मुताबिक हालांकि इस बात की संभावना कम है कि कांग्रेस को यूपी में एससी फार्मूले का खास फायदा मिलने वाला है क्योंकि यहां पार्टी का मुकाबल भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडे और मायावती के एससी वोटरों में पकड़ मजबूत से है। फिर भी यदि ऐसा होता है तो भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में एक मुश्किल खड़ी हो जाएगी। पंजाब में कांग्रेस का यह प्रयोग भाजपा पर भी इस बात के लिए दबाव डालेगा कि वह यूपी में नए सिरे से राजनीतिक और जातीय समीकरण को साधे। अभी तक पार्टी योगी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ने की बात कह रही है।
जानकारों का मानना है कि यदि इन पांच महीनों में चन्नी पंजाब में सत्ता विरोधी लहर को दूर करने में कामयाब हो गए तो इसका फायदा कांग्रेस को पंजाब में मिलेगा ही, वे एससी चेहरे के तौर पर दूसरे राज्यों में भी पार्टी का ग्राफ ऊंचा कर सकते हैं। संकेत तो यह मिल रहे हैं कि चन्नी कांग्रेस के लिए यूपी-उत्तराखंड में चुनाव प्रचार करने के लिए स्टार कैंपेंनर के तौर पर भी शामिल किए जा सकते हैं।
चन्नी के सीएम बनते ही यूपी में ही सबसे ज्यादा हलचल
यह देखना काफी दिलचस्प है कि चरणजीत सिंह चन्नी तो सीएम पंजाब के बने हैं लेकिन उनकी ताजपोशी को लेकर सबसे ज्यादा हलचल यूपी में ही है। यूपी में करीब 21 फीसदी आबादी एससी समुदाय से है। यूपी में 86 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। मायावती के रूप में उत्तर प्रदेश को एक−दो बार नहीं बल्कि चार बार मुख्यमंत्री के तौर पर एक एससी नेतृत्व मिला।
इसलिए पंजाब में हुए सियासी घटनाक्रम के बाद एक तरफ जहां मायावती ने कांग्रेस पर ताबड़तोड़ हमला बोला वहीं सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अनूसूचित जाति के लिए किए अपने कार्यों की उपलब्धियों को गिनाते हुए एक के बाद एक कई ट्वीट किए। उससे पहले मुख्यमंत्री रविवार को वाराणसी में पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल हुए थे।
मायावती अकाली दल के साथ मिलकर पंजाब में अपने पैर जमाने की कोशिश तो कर रही हैं लेकिन उनका असल दांव तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में लगेगा। जहां बीते करीब तीन दशक से दलितों के सबसे ज़्यादा वोट शेयर पर उनकी पार्टी को मिलता रहा है। जबकि 2014 के बाद से भाजपा भी दलितों को अपने साथ लाने के लिए कोशिश करने लगी है।
सीएसडीएस-लोकनीति के अध्ययन के मुताबिक 2009 से पहले तक भाजपा के के पास एससी वोट महज 10-12 फीसदी थे जो 2014 में बढ़कर दोगुने 24 फीसदी हो गए। 2019 में यह ग्राफ और ऊपर उठा और भाजपा को 34 फीसदी एससी वोट मिले। लिहाजा पंजाब में बने नए राजनीतिक समीकरण भाजपा को यूपी में अपने समीकरण दुरुस्त करने के लिए मजबूर कर सकती है।
उत्तराखंड में क्या
उत्तराखंड में लगभग 18 फीसदी वोट एससी समुदायों का है। राज्य के कम से कम 18 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां एससी समुदाय निर्णायक स्थिति में हैं। भाजपा, कांग्रेस समेता बसपा की भी नजर इन वोट बैंक पर है। हालांकि राज्य की राजनीति राजपूत बनाम ब्राह्मणों के बीच ही केंद्रित रहती है, लेकिन कांग्रेस सभी समुदायों को जगह देने के लिए इस बार किसी किसी भी तरह एससी कार्ड खेल सकती है। पंजाब के प्रभारी और उत्तराखंड के वरिष्ठ नेता हरीश रावत पंजाब के सियासी संकट को सुलझाने में पार्टी नेतृत्व के नुमाइंदे थे। माना जा रहा है कि पार्टी उत्तराखंड चुनाव में हरीश रावत की इस भूमिका का फायदा उठाने की कोशिश कर सकती है।
कुछ एससी नेता जो मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच सके
चरणजीत सिंह चन्नी से पहले 1947 से लेकर अब तक देश में कई एससी नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब हुए हैं। उनमें मुख्य तौर पर आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री दामोदरम संजिवैय्या रेड्डी ( कांग्रेस-1960), बिहार के मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री (कांग्रेस-1978), बिहार के ही मुख्यमंत्री रहे राम सुंदर दास (जनता दल-1979), राजस्थान के मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया (कांग्रेस-1980) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे (कांग्रेस- 2003) उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं मायावती (बसपा-2007) और बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी (जदयू-2014) का नाम शामिल है। उत्तर प्रदेश में बसपा की मजबूत पकड़ की वजह से मायावती ने 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। लेकिन 2012 में उनकी सत्ता जाने के बाद से यूपी में कोई एससी सीएम नहीं बन सका।