90 के दशक में असम की राजनीति में भूचाल लाने वाले गुप्त हत्याकांड (Secret Killing Case) मामले में पूर्व सीएम प्रफुल्ल महंत को गुवाहाटी हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। दरअसल गुवाहाटी हाईकोर्ट ने प्रफुल्ल महंत को क्लीन चिट देते हुए गुप्त हत्याकांड मामले में दायर इंटरलॉक्यूटरी एप्लीकेशन (interlocutory application) को खारिज कर दिया है। गुवाहाटी हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने सोमवार को दिए अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता अपने दावे के पक्ष में सबूत पेश करने में विफल रहे हैं।
हाईकोर्ट ने की ये टिप्पणी
बता दें कि इंटरलॉक्यूटरी एप्लीकेशन राज्य सभा सांसद अजित कुमार भुयन और अनंत कालिता ने हाईकोर्ट में दायर की थी। इस याचिका में 3 सितंबर 2018 के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें कोर्ट ने गुप्त हत्याकांड की जांच के लिए बने आयोग को अवैध बताकर खारिज कर दिया था। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मिताली ठाकुरिया की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता ने फैसले के 531 दिन बाद क्यों इंटरलॉक्यूटरी एप्लीकेशन दायर की? याचिका में देरी की वजह भी नहीं बताई गई है। ऐसे में कोर्ट ने रिट अपील को भी खारिज कर दिया।
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क्या है पूरा विवाद
उल्लेखनीय है कि साल 1998 से लेकर 2001 के बीच असम में उग्रवादी संगठन उल्फा से जुड़े लोगों के रिश्तेदारों और परिजनों की हत्याएं हुईं। इन हत्याओं के कातिल के बारे में कुछ पता नहीं चल सका तो इन्हें गुप्त हत्याकांड का नाम दे दिया गया। इसके आरोप राज्य के सीएम रहे प्रफुल्ल महंत पर लगे। साल 2005 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने हत्याओं की जांच के लिए जस्टिस (रिटायर्ड) केएन सैकिया की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया था।
आयोग ने 2007 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी, जिसमें प्रफुल्ल महंत को आरोपी बनाया गया। इसके खिलाफ महंत ने गुवाहाटी हाईकोर्ट का रुख किया। जिस पर सितंबर 2018 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने जांच आयोग को अवैध बताकर खारिज कर दिया। इसके बाद 2021 में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली इंटरलॉक्यूटरी याचिका दायर की गई, जिसे अब हाईकोर्ट द्वारा अवैध बताकर खारिज कर प्रफुल्ल महंत को बड़ी राहत दी है।