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Assam: 30 साल पुराने फर्जी मुठभेड़ मामले में दोषी नहीं मिले सैन्य अधिकारी, परिजनों को मुआवजा देकर केस किया बंद

Sun, 04 Aug 2024 12:01 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी

सार

तिनसुकिया जिले में वर्ष 1994 में एक चाय उद्यान प्रबंधक की प्रतिबंधित उग्रवादी समूह उल्फा ने हमले के बाद हत्या कर दी थी। मामले में पंजाब रेजीमेंट के सैन्यकर्मियों की एक टीम ने पांच युवकों को उनके कार्यालय और घरों से उठाया था। 23 फरवरी 1994 को पांचों के शव स्थानीय पुलिस को सौंपे गए और कहा गया कि युवक मुठभेड़ में मारे गए हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik
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विस्तार
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असम में 30 साल पहले फर्जी मुठभेड़ में पांच युवकों की मौत के मामले में मेजर जनरल, दो कर्नल समेत सात सैन्यकर्मियों को कोर्ट मार्शल अधिकारियों ने समीक्षा के बाद  दोषी नहीं माना है। मामले में कोर्ट के आदेश पर युवकों के परिजनों को 20-20 लाख का मुआवजा देकर केस बंद कर दिया गया। इसे मृत युवकों के परिजनों ने अधूरा न्याय करार दिया है। साथ ही मामले की जांच को लेकर सवाल उठाए हैं। परिजनों का कहना है कि सीबीआई ने अपनी जांच में सभी को दोषी माना था।

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असम के तिनसुकिया जिले में वर्ष 1994 में एक चाय उद्यान प्रबंधक की प्रतिबंधित उग्रवादी समूह उल्फा ने हमले के बाद हत्या कर दी थी। मामले में पंजाब रेजीमेंट के सैन्यकर्मियों की एक टीम ने 17 और 19 फरवरी 1994 को प्रबीन सोनोवाल, अखिल सोनोवाल, देबजीत विश्वास, प्रदीप दत्ता और भूपेन मोरन को उनके कार्यालय और घरों से उठाया था। 23 फरवरी 1994 को पांचों के शव स्थानीय पुलिस को सौंपे गए और कहा गया कि युवक मुठभेड़ में मारे गए हैं।  

मामले में तत्कालीन छात्र नेता जगदीश भुइयां ने 1994 में गुवाहाटी हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मुठभेड़ को फर्जी करार दिया था। उन्होंने कहा था कि युवकों का उग्रवादी समूह उल्फा से कोई संबंध नहीं था। साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया था कि पांचों युवकों की आंखें बाहर निकली थीं। नाखून तोड़ गए थे और घुटने टूटे थे। असली मुठभेड़ में ऐसा संभव नहीं है। उन्होंने युवकों की निर्दोष बताया था। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई।
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सीबीआई ने 2002 में गुवाहाटी एक अदालत में चार्जशीट दायर की और कहा कि मृतकों के शरीर पर पाई गईं चोटें मुठभेड़ के दौरान नहीं लगी थीं। सीबीआई ने मामले में पांच सैन्यकर्मी तत्कालीन कैप्टन आर के शिवरेन, जेसीओ और एनसीओ दलीप सिंह, पलविंदर सिंह, शिवेंदर सिंह और जगदेव सिंह को जिम्मेदार ठहराते हुए हत्या का मुकदमा चलाने के लिए कहा। इसके बाद छह फरवरी 2002 को सीबीआई ने एक और रिपोर्ट दायर की। इसमें कहा गया कि कर्नल एके लाल ने फर्जी मुठभेड़ की पूरी योजना बनाई और मेजर थॉमस मैथ्यू ने गोली चलाने का आदेश दिया था। इसलिए इन पर भी हत्या का मुकदमा चलाया जाए। 

सीबीआई ने विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट कामरूप गुवाहाटी से अपील की थी कि आरोपियों पर कोर्ट मार्शल कार्यवाही के लिए सेना अधिकारियों को आरोप पत्र भेजा जाए। इसके बाद 13 अक्टूबर 2018 को दिनजान (डिब्रूगढ़) की एक सैन्य अदालत ने कोर्ट मार्शल की कार्यवाही के दौरान भी सैन्य कर्मियों को पांचों युवकों की हत्या का दोषी माना। 1950 सेना अधिनियम के तहत कोर्ट मार्शल की पुष्टि सक्षम प्राधिकारी द्वारा किए जाने की आवश्यकता थी। इसलिए मामला सेना सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा गया। 
 
फिर सेना के अधिकारी ने 5 नवंबर, 2019 को अपने आदेश में संशोधन के लिए मामले को कोर्ट मार्शल अधिकारियों को वापस भेज दिया। संशोधन में कोर्ट मार्शल अधिकारियों ने कुछ और सबूत लिए और एक मार्च, 2020 को सेना के जवानों को दोषी नहीं माना। इस फैसले के खिलाफ असम जातीय परिषद के महासचिव जगदीश भुइयां ने कहा कि प्रारंभिक कोर्ट मार्शल आदेश को कैसे उलट दिया गया और सीबीआई जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया गया। इसके बाद पीड़ित परिवार हाईकोर्ट पहुंचे। 

कोर्ट में न्यायाधीश अचिंत्य मल्ला बुजोर बरुआ और रॉबिन फुकन की पीठ ने तीन मार्च 2020 को एक आदेश देकर केंद्र सरकार को पीड़ितों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। हाल ही में 31 जुलाई को परिजनों के खातों में यह राशि जमा की गई।

मामले में जगदीश भुइयां ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ सैन्य अधिकारियों को कम से कम पेंशन में कटौती जैसी कार्रवाई करनी चाहिए थी। पीड़ित प्रदीप दत्ता के भाई दीपक दत्ता ने बताया कि दुखद है कि आरोपियों को कोई सजा नहीं मिली। प्रदीप की शादी एक महीने से भी कम समय पहले हुई थी जब आधी रात को सोते समय सेना के जवानों ने उसे उठा लिया था। अखिल सोनोवाल की भाभी रूपा सोनोवाल ने कहा कि परिवारों को न्याय नहीं सिर्फ मुआवजा मिला।

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