दधिया गांव के रहनेवाले प्रांजल कसारी ने पीटीआई से कहा कि हम यहां से निकलना चाहते हैं, जितनी जल्दी हो सके उतना बेहतर। हम यहां पीढ़ियों से रह रहे हैं। मैं नहीं चाहता कि आने वाली पीढ़ियां भी उन्हीं मुश्किलों का सामना करें। क्या आप मूलभूत सुविधाओं के बिना जिंदगी की कल्पना कर सकते हैं?
पार्क के अंदर बिजली या वाहन चलने लायक सड़क तो सोच से परे है। हमारे मौलिक मानवाधिकार तक नहीं हैं। हम दुनिया के दूसरे हिस्सों से अलग-थलग हैं। यहां कोई टीवी नहीं है और हमें बमुश्किल अखबार पढ़ने को मिलता है।
ये विस्थापित कृषक लोग जो नदी किनारे रहना पसंद करते थे, उन्हें ब्रह्मपुत्र का दक्षिणी किनारा पार करना पड़ा और वे इस इलाके में आ गए जो छह नदियों- उत्तर की तरफ लोहित, दिबांग, दिसांग तथा दक्षिण की तरफ अनंतनाला, दनगोरी और डिब्रू- से घिरा है।
खेती और मछली पकड़ने पर निर्भर यह कृषक समुदाय बाढ़ के कारण होने वाले क्षरण की वजह से आजीविका के लिए वन में भटकने लगा। समय बीतने के साथ 1950 के दशक के दो मूल गांव लाइका और दधिया अब छह बस्तियों में फैल गए हैं जहां 2600 परिवारों में करीब 12000 लोग रहते हैं।
हालांकि समस्या 1999 में शुरू हुई जब जंगल को डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया और संरक्षित इलाके के अंदर इंसानों का रहना अवैध हो गया। तब से असम गण परिषद, कांग्रेस और भाजपा इस पूर्वोत्तर राज्य पर शासन कर चुके हैं लेकिन इनके पुनर्वास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। लाइका गांव के सेवली पेगु का कहना है कि मानसून के दौरान गांव महीनों तक पानी से घिरे रहते हैं। उन्होंने कहा, 'इंसान और सूअर बाढ़ ग्रस्त इलाके में एक ही जगह रहने को मजबूर होते हैं।'
सीएम हिमंत बिश्व सरमा को लिखा पत्र
इस बीच, सत्ताधारी गठबंधन के घटक अगप के विधायक पोनाकन बरुआ ने 24 मई को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को पत्र लिखकर इस समुदाय की पीड़ा साझा की थी और जिक्र किया कि पूर्व में चार बार इन लोगों के पुनर्वास का प्रयास किया जा चुका है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। उन्होंने यह भी कहा कि करीब 600 परिवार महीनों से विभिन्न शिविरों में रह रहे हैं लेकिन उनके पुनर्वास के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए।