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Article 370: घावों को भरने, सामाजिक ताने-बाने को बहाल करने की जरूरत, जस्टिस कौल की अलग फैसले में अहम टिप्पणी

Mon, 11 Dec 2023 06:41 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Article 370: न्यायमूर्ति एसके कौल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को अस्थिर स्थिति के कारण भारी कीमत चुकानी पड़ी है। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान पहले से ही खंडित समाज पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आघात के परिणामों को देखा है।
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जस्टिस एस.के.कौल (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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जस्टिस संजय किशन कौल ने अपने अलग फैसले में कहा कि जम्मू-कश्मीर में घावों को भरने और सामाजिक ताने-बाने को बहाल करने की जरूरत है। उन्होंने मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच कर रिपोर्ट करने और सुलह के उपायों की सिफारिश करने के लिए एक निष्पक्ष ‘सत्य और सुलह’ आयोग के गठन की सिफारिश की है। राज्य और गैर-राज्य अभिकर्ता 1980 के दशक से यह मांग कर रहे हैं।

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जस्टिस कौल ने अपने फैसले में कहा, कश्मीर घाटी पर ‘ऐतिहासिक बोझ’ है और वहां रहने वाले लोग कई दशकों से चल रहे संघर्षों के शिकार रहे हैं। लोगों के घावों को भरने की जरूरत है। उन्होंने विशेष रूप से 1980 के दशक में घाटी में उग्रवाद से पैदा हुई समस्याओं का जिक्र किया, जिसकी परिणति जनसंख्या के एक हिस्से (कश्मीरी पंडितों) के अन्य हिस्सों में प्रवास के रूप में हुई। चूंकि उस स्थिति ने भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डाल दिया, इसलिए सेना को बुलाना पड़ा।

जस्टिस कौल ने कहा, सेना राज्य के दुश्मनों के साथ लड़ाई लड़ने के लिए है न कि वास्तव में राज्य के भीतर कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए। लेकिन तब अजीब समय था। राष्ट्र की अखंडता और विदेशी घुसपैठ के खिलाफ सेना वहां दाखिल हुई। राज्य के पुरुषों, महिलाओं व बच्चों ने भारी कीमत चुकाई।
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1996 में हुए चुनाव से लोकतंत्र की पुन:स्थापना की पुष्टि हुई
जस्टिस कौल ने कहा कि 1996 में हुए चुनावों से लोकतंत्र की पुन: स्थापना की पुष्टि की गई थी। कश्मीर समस्या का शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए उसके बाद लगातार प्रयास किए गए। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने कहा कि राज्य की स्वायत्तता के लिए ‘...आसमान ही सीमा है’ और अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘इंसानियत,जम्हूरियत, कश्मीरियत’ (मानवतावाद, लोकतंत्र, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द के साथ कश्मीर की समावेशी संस्कृति) का नारा बुलंद किया। 

पंडितों के बड़े पलायन ने सांस्कृतिक लोकाचार बदला
जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि कश्मीरी पंडित समुदाय के बड़े पैमाने पर पलायन ने कश्मीर के सांस्कृतिक लोकाचार को बदल दिया। सीमा पार से बढ़ते कट्टरवाद के कारण तीन दशक बीत जाने के बाद भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। जस्टिस कौल ने 121 पन्ने के आदेश में कश्मीर के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा, भगवान और प्रकृति कश्मीर घाटी के प्रति बहुत दयालु रहे हैं। दुर्भाग्य से, मानव प्रजाति इतनी विचारशील नहीं रही है। 1980 के दशक में कुछ कठिन समय 1987 के चुनावों में समाप्त हुआ। इसको लेकर खूब आरोप प्रत्यारोप लगे।

मैंने खुद घाटी में पहले से ही खंडित समाज में ‘अंतर पीढ़ीगत आघात’ के निशान देखे
जस्टिस कौल ने कहा, क्षेत्र की अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने पहले से ही खंडित समाज में ’अंतर-पीढ़ीगत आघात’ के निशान देखे। महत्वपूर्ण सिर्फ अन्याय की पुनरावृत्ति को रोकना नहीं है बल्कि क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने की बहाली है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र अपने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जाना जाता था, जो विभाजन के समय भी खराब नहीं हुआ था। यही वजह थी जिसने महात्मा गांधी को यह कहने के लिए प्रेरित किया कि कश्मीर मानवता के लिए आशा की किरण है।

दक्षिण अफ्रीका में सत्य व सुलह आयोगों का दिया हवाला
जस्टिस कौल ने रंगभेद युग के दौरान अत्याचारों के संबंध में द. अफ्रीका में सत्य और सुलह आयोगों का हवाला दिया। उन्होंने कहा, याद्दाश्त खत्म होने से पहले आयोग का गठन किया जाना चाहिए। प्रक्रिया समयबद्ध होनी चाहिए। युवाओं की एक पूरी पीढ़ी अविश्वास की भावना के साथ बड़ी हुई है, इसकी भरपाई उन्हें ही करनी है। सत्य और सुलह आयोग एक सुधारात्मक दृष्टिकोण की सुविधा प्रदान कर सकता है, जो अतीत के घावों के लिए क्षमा या भूलने को सक्षम बनाता है और एक साझा राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने का आधार बनाता है।

आगाह भी किया, आपराधिक अदालत न बन जाए आयोग
जस्टिस कौल ने आगाह किया कि आयोग को एक आपराधिक अदालत में तब्दील नहीं होना चाहिए। उसे मानवीय और वैयक्तिकृत प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे लोग बिना किसी हिचकिचाहट के अपने साथ जो कुछ भी हुआ, उसे साझा कर सकें। यह संवाद पर आधारित होना चाहिए, जिसमें सभी पक्षों से अलग-अलग दृष्टिकोण और इनपुट की अनुमति हो।
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सीमा पार से मिला कट्टरवाद को बढ़ावा
जस्टिस कौल ने कहा कि सीमा पार से कट्टरवाद को बढ़ावा मिला है। 1971 में बांग्लादेश निर्माण को भुलाया नहीं गया है। बेरोजगार व निराश युवाओं को योद्धाओं की तरह प्रशिक्षित किया गया, अराजकता पैदा करने के लिए कश्मीर में भेजा गया। यह उन लोगों के लिए बड़ा बदलाव था, जो आस्था के बावजूद शांति व सहिष्णुता के लिए जाने जाते थे। कश्मीरी शैववाद और इस्लामी सूफीवाद पर उग्रवादी प्रवृत्तियों ने कब्जा कर लिया। लब्बोलुआब यह है कि 35 वर्ष या उससे कम उम्र की पीढ़ी ने कश्मीर में समाज का आधार बनाने वाले विभिन्न समुदायों के सांस्कृतिक परिवेश को नहीं देखा है।
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