दक्षिण अफ्रीका में सत्य व सुलह आयोगों का दिया हवाला
जस्टिस कौल ने रंगभेद युग के दौरान अत्याचारों के संबंध में द. अफ्रीका में सत्य और सुलह आयोगों का हवाला दिया। उन्होंने कहा, याद्दाश्त खत्म होने से पहले आयोग का गठन किया जाना चाहिए। प्रक्रिया समयबद्ध होनी चाहिए। युवाओं की एक पूरी पीढ़ी अविश्वास की भावना के साथ बड़ी हुई है, इसकी भरपाई उन्हें ही करनी है। सत्य और सुलह आयोग एक सुधारात्मक दृष्टिकोण की सुविधा प्रदान कर सकता है, जो अतीत के घावों के लिए क्षमा या भूलने को सक्षम बनाता है और एक साझा राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने का आधार बनाता है।
आगाह भी किया, आपराधिक अदालत न बन जाए आयोग
जस्टिस कौल ने आगाह किया कि आयोग को एक आपराधिक अदालत में तब्दील नहीं होना चाहिए। उसे मानवीय और वैयक्तिकृत प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे लोग बिना किसी हिचकिचाहट के अपने साथ जो कुछ भी हुआ, उसे साझा कर सकें। यह संवाद पर आधारित होना चाहिए, जिसमें सभी पक्षों से अलग-अलग दृष्टिकोण और इनपुट की अनुमति हो।
सीमा पार से मिला कट्टरवाद को बढ़ावा
जस्टिस कौल ने कहा कि सीमा पार से कट्टरवाद को बढ़ावा मिला है। 1971 में बांग्लादेश निर्माण को भुलाया नहीं गया है। बेरोजगार व निराश युवाओं को योद्धाओं की तरह प्रशिक्षित किया गया, अराजकता पैदा करने के लिए कश्मीर में भेजा गया। यह उन लोगों के लिए बड़ा बदलाव था, जो आस्था के बावजूद शांति व सहिष्णुता के लिए जाने जाते थे। कश्मीरी शैववाद और इस्लामी सूफीवाद पर उग्रवादी प्रवृत्तियों ने कब्जा कर लिया। लब्बोलुआब यह है कि 35 वर्ष या उससे कम उम्र की पीढ़ी ने कश्मीर में समाज का आधार बनाने वाले विभिन्न समुदायों के सांस्कृतिक परिवेश को नहीं देखा है।