सेना के जनरल कोर्ट मार्शल ने एक सेवानिवृत्त सूबेदार को उस मामले में बरी करने की सिफारिश की है, जिस पर सेना से जुड़े संवेदनशील जानकारी की रक्षा करने में विफल होने का आरोप लगाया गया था। वकील अक्षित आनंद ने बताया कि रिकॉर्ड पर इस बात का कोई सबूत नहीं है कि सेना के जवान के पास उन दस्तावेजों पर कोई पहुंच या अधिकार था, जिन्हें कथित तौर पर लीक किया गया था।
सेना के जनरल कोर्ट मार्शल ने एक सेवानिवृत्त सूबेदार को उस मामले में बरी करने की सिफारिश की है, जिस पर सेना से जुड़े संवेदनशील जानकारी की रक्षा करने में विफल होने का आरोप लगाया गया था। गौरतलब है कि सेवानिवृत्त सूबेदार पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए थे और हेड क्लर्क के कर्तव्यों को पालन करने समय दस्तावेजों की देखभाल करने में विफल रहे थे।
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ये लगाए गए थे आरोप?
वर्ष 2020-21 में जूनियर कमीशंड अधिकारी सेवा पर था और सेना के एक फॉर्मेशन में तैनात सैनिकों द्वारा कथित तौर पर जानकारी लीक की गई थी। सेना अधिनियम की धारा 63 के तहत भी आरोप लगाए गए और सूचना और दस्तावेजों की निगरानी नहीं करने का आरोप लगाया गया, जिसके कारण वे लीक हो गए।
सेवानिवृत्त होने के बाद भी चला मुकदमा
सूबेदार अक्तूबर 2021 में ही सेना से सेवानिवृत्त हो गए थे, लेकिन उनके खिलाफ लंबित अनुशासनात्मक कार्रवाई को पूरा करने के लिए सेना अधिनियम की धारा 123 लागू होने के बाद उन्हें वापस बुला लिया गया था। जनरल कोर्ट मार्शल 4 जनवरी, 2024 को इकट्ठा हुआ, जिसमें कुल मिलाकर 8 अभियोजन गवाहों से पूछताछ की गई।
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सेना के जवान को किया गया बरी- अक्षित आनंद
जूनियर अधिकारी के वकील अक्षित आनंद ने बताया कि रिकॉर्ड पर इस बात का कोई सबूत नहीं है कि सेना के जवान के पास उन दस्तावेजों पर कोई पहुंच या अधिकार था, जिन्हें कथित तौर पर लीक किया गया था। अदालत को भी कोई सबूत नहीं मिला कि जूनियर कमीशंड अधिकारी ने दस्तावेज छोड़े थे।
आनंद ने कहा कि यह एक ऐसा मामला था जहां जूनियर कमीशंड अधिकारी पर सेवानिवृत्ति के बाद आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम की धारा 5 के साथ-साथ सेना अधिनियम की धारा 63 के तहत आरोप लगाया गया था। जूनियर कमीशंड अधिकारी के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं था। जनरल कोर्ट मार्शल ने जूनियर कमीशंड अधिकारी को बरी कर दिया है और न्याय की जीत हुई है।