सशस्त्र बलों ने आज एक समारोह में 1971 के युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के प्रतीक राइफल और हेलमेट को इंडिया गेट से हटाकर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर परम योद्धा स्थल पर स्थानांतरित कर दिया। इन्हें परम वीर चक्र पुरस्कार विजेताओं की प्रतिमाओं के बीच स्थापित किया गया है।
एयर मार्शल बीआर कृष्णा ने किया नेतृत्व
रक्षा मंत्रालय ने कहा कि 1971 के युद्ध के शहीद सैनिकों के स्मारक का राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के साथ एकीकरण पूरा हो गया है। समारोह का नेतृत्व चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के अध्यक्ष, चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी एयर मार्शल बीआर कृष्णा ने किया और तीनों सेवाओं के जनरल समकक्षों ने इसमें भाग लिया।
समारोह के हिस्से के रूप में अंतिम सलामी दी गई और सीआईएससी ने इंडिया गेट पर माल्यार्पण किया। इसके बाद उल्टे राइफल और हेलमेट को हटा दिया गया और एक औपचारिक वाहन में परम योद्धा स्थल तक ले जाया गया और एक नव निर्मित स्मारक में स्थापित किया गया। तीन सेवाओं के एजी समकक्षों के साथ सीआईएससी ने नए स्मारक को सलामी दी।
अमर जवान ज्योति के विलय का फैसला
दिल्ली के इंडिया गेट पर बीते 50 सालों से जलने वाली अमर जवान ज्योति का समीप ही बने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जल रही ज्योति में विलय करने का फैसला इस साल जनवरी में लिया गया था। तब इसे लेकर सियासी बवाल पैदा हो गया था। कांग्रेस ने इस फैसले को लेकर सरकार पर निशाना साधा था।
वहीं, केंद्र सरकार का कहना था कि वह अमर जवान ज्योति को बुझा नहीं रही है, बल्कि उसका कुछ ही दूरी पर बनाए गए राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की ज्वाला में विलीन किया जा रहा है। केंद्र का कहना था कि अमर जवान ज्योति के स्मारक पर 1971 और अन्य युद्धों के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन उनके नाम वहां नहीं हैं। इंडिया गेट पर केवल कुछ शहीदों के नाम अंकित हैं, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध और एंग्लो-अफगान युद्ध में अंग्रेजों के लिए लड़ाई लड़ी थी। यह हमारे औपनिवेशिक अतीत का प्रतीक है।
इंदिरा गांधी ने 1972 में किया था अमर जवान ज्योति का उद्घाटन
अमर जवान ज्योति की स्थापना उन भारतीय सैनिकों की याद में की गई थी जो 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए थे। इस युद्ध में भारत की विजय हुई थी और बांग्लादेश का गठन हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 26 जनवरी 1972 को अमर जवान जोत का उद्घाटन किया था।