चीन और भारत के बीच गलवां घाटी में जारी गतिरोध की जड़ें अनुच्छेद-370 के विवादित प्रावधानों के उन्मूलन से जुड़ी हो सकती हैं? विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा हो सकता है, क्योंकि 5 अगस्त 2019 को भारत ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले इस कानून के विवादित अंशों को हटा दिया था।
चीन के विषय के जानकार रंगाचारी ने कहा कि पिछले 10-12 सालों से चीन यह रणनीति अपनाता रहा है कि वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, थोड़ा आगे बढ़ जाने के बाद वह वहां कुछ स्थायी निर्माण करता है और सैनिक जरूरतों की चीजों को इकट्ठा करता है।
कुछ समय बीत जाने के बाद वह फिर कुछ दूर आगे बढ़कर कब्जा करने की कोशिश करता है। इस तरह की कोशिश से वह इन इलाकों पर अपना कब्जा मजबूत दिखाना चाहता है। उन्होंने कहा कि भारत के मामले में भी वह लगातार इसी रणनीति के साथ आगे बढ़ता रहा है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जब भी आंतरिक या बाहरी स्तर पर किसी गंभीर समस्या से जूझने लगता है, वह पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद जैसी चीजों को उभार देता है।
इससे उसकी जनता का ध्यान मुख्य समस्या से हटकर दूसरी समस्या पर चला जाता है।
इस समय भी चीन कई समस्याओं से जूझ रहा है। कोरोना वायरस के प्रसार के मामले में भी दुनिया का दबाव उस पर बना हुआ है। इसी बीच हांगकांग में चीनी सरकार के खिलाफ गुस्सा अपने चरम पर है। पूरी दुनिया में उसके आर्थिक बायकाट की बातें हो रही हैं।
क्या ऐसे में चीन एक बार फिर अपने उसी पुराने नुस्खे को आजमाना चाहता है? रंगाचारी ने कहा कि इस तरह की बातों पर चर्चा होती है।
इनके पीछे कुछ ठोस आधार हो भी सकता है क्योंकि 1949, 1962 और वियतनाम युद्ध के पीछे इसी तरह की परिस्थितियां जिम्मेदार बताई गई थीं।
भारत के पड़ोसी देशों से उसके संबंध लगातार बिगड़ रहे हैं। पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। चीन से भी समय-समय पर विवाद होता रहा है। लेकिन अब नेपाल भी उसी श्रेणी में जाता दिख रहा है।
सीएए कानून के दौरान बांग्लादेश भी भारत से नाराजगी प्रकट कर रहा था। क्या ऐसे में भारत को अपनी विदेश नीति बदलने की जरूरत है?
इस सवाल पर रंगाचारी का कहना है कि विदेश नीति कभी स्थायी चीज नहीं हो सकती। समय के हिसाब से इसमें परिवर्तन होता रहता है और अपनी जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए इसमें लगातार परिवर्तन करना भी चाहिए।
लेकिन जहां तक भारत का अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की बात है, पाकिस्तान को छोड़ बाकी देशों के साथ संबंधों को सहेजा जा सकता है। नेपाल से हमारे रोटी-बेटी के रिश्ते रहे हैं। थोड़ी सी कोशिश से इसे उचित रूप दिया जा सकता है।