राजनीतिक दल, चालाक थे। उन्हें मालूम था कि किसान संगठित नहीं हैं। वादा करो और भूल जाओ। अविक साहा के अनुसार, सरकार जानती थी कि ये लोग असंगठित हैं। ये लड़ नहीं सकते। वोट हमें ही देंगे। यह लंबे समय तक चलता रहा। भाजपा सरकार उसी गलतफहमी का शिकार हो गई। यह सोचकर कि किसान बोलेंगे नहीं, तीन काले कृषि कानून बना दिए। कंपनियों के हाथ में कृषि को सौंपने का खाका तैयार कर दिया। इतना ही नहीं, किसानों की जमीन आसानी से हड़प ली जाए, यह राह भी आसान बना दी। खैर कोई बात नहीं, सरकार को पीछे हटना होगा। अब किसानों के बच्चे पढ़ रहे हैं। घर में सोशल मीडिया वाले फोन भी हैं। किसान की समस्या, अब हर कोई जान रहा है, समझ भी रहा है। अब किसान आंदोलन, लोगों के बीच जाकर जो राह तैयार कर रहा है, वह ऐसी है कि वहां कोई भी पार्टी या सरकार झूठा दिलासा नहीं दे सकेगी।
राजनीतिक दल और सरकार, किसानों के साथ धोखा नहीं कर सकेंगे। इस आंदोलन का दूरगामी असर नजर आएगा। केवल किसान का परिवार ही नहीं, बल्कि देश का हर नागरिक इससे जुड़ेगा। अविक साहा ने कहा, किसान आंदोलन, चुनाव नहीं लड़ेगा। उसका मकसद किसान को सिखाना है। हम उसे समझा रहे हैं कि आज 1947 नहीं, 2021 है। बहुत जल्द वह समय देखेंगे, जब राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव में किसान 'केंद्र' में होगा। किसान को अब अपनी संख्या, ताकत और एकजुटता का अहसास हो गया है। हर राज्य में किसानों की टोलियां जा रही हैं। सरकार को हर मोर्चे पर घेरा जाएगा। कोई भी राजनीतिक दल किसानों को धोखा देने की हिम्मत नहीं कर सकेगा। बतौर अविक साहा, किसानों के नए प्लेटफार्म का असर अगले साल होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में देखने को मिलेगा।