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'सरहद पर मौत तो बना दिया हीरो, पर...'

Sun, 13 Mar 2016 11:39 AM IST
आकार पटेल/ बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए

सार

  • भारत इकलौता एक खास देश
  • लोग उस भाषा में बात करते हैं जो आम लोगों की है ही नहीं
  • शहरी मध्यवर्ग की चिंताएं राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में सबसे ज्यादा नजर आती हैं
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कन्हैया के समर्थन में छात्र - फोटो : BBC
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विस्तार
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एक नजरिए से भारत खास देश है। यह इकलौता ऐसा प्रमुख देश है जिसमें अभिजात्य तबका अपनी भाषा में बात नहीं करता है, वह उस भाषा में बात करता है जो आम लोगों की भाषा भी नहीं है। यह दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद या फिर किसी भी अन्य शहर की वास्तविकता है। यहां अभिजात्य से मेरा तात्पर्य शहरी मध्य वर्ग से है, अल्पसंख्यक होते हुए भी देश के आर्थिक एजेंडे और राष्ट्रीय सुर्खियों के एजेंडे में इनका दबदबा दिखता है।सरकारी आंकडों के मुताबिक केवल पांच करोड यानी करीब चार फीसदी भारतीयों के पास पासपोर्ट है।
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मेरा अनुमान है कि यह संख्या उन लोगों की संख्या से बहुत ज्यादा होगी जिनकी पहली भाषा अंग्रेजी होगी। ये लोग अपनी मातृभाषा बोलना जानते होंगे जो हिंदी, गुजराती, मराठी, तेलुगू, ओडिया या फिर कन्नड कुछ भी संभव है। लेकिन ये लोग इसका इस्तेमाल नहीं करते। ये लोग अपनी मातृभाषा के वर्णों को पहचान जरूर लेते हैं, लेकिन वे अपनी मातृभाषा का ना तो साहित्य पढते हैं और ना ही समाचार देखते हैं। संगीत को छोडकर उनकी सांस्कृतिक प्राथमिकताएं जिनमें टीवी धारावाहिक और सिनेमा शामिल हैं, सब अंग्रेजी की सामग्री होती हैं।

ये कहा जा सकता है कि भारतीय लंबे समय से अंग्रेजी बोलते और लिखते रहे हैं और इस लिहाज से अंग्रेजी को भारतीय भाषा समझा जाना चाहिए। मैं इसे सशर्त स्वीकार कर लूंगा, लेकिन तब यह बताऊंगा कि जो अंग्रेजी हमारे टीवी चैनलों पर बोली जा रही है और जो हमारी मीडिया में लिखा जा रहा है वह वास्तविक अंग्रेजी का कच्चा संस्करण है। बहरहाल ऐसी अंग्रेजी किस तरह से हम पर प्रभाव डाल रही है?इसका पहला पहलू तो यही है कि शहरी मध्य वर्ग की चिंताएं राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में सबसे ज्यादा नजर आती हैं।
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हमारा मीडिया कुपोषण से होनेवाली मौतों की तुलना में कुछ छात्रों के नारे लगाने की घटना को कहीं ज्यादा तरजीह देता है। यह स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रविरोधी नारों से सीधे तौर पर कितने भारतीय प्रभावित हुए हैं। हम उन छात्रों के नारों से आहत हो सकते हैं, लेकिन नारे तो केवल शब्द भर थे। हर साल कुपोषण से पांच लाख भारतीय बच्चों की मौत होती है। लेकिन यह कभी किसी टीवी बहस का मुद्दा नहीं बनता, क्योंकि यह अंग्रेजी बोलने वाले मध्य वर्ग को प्रभावित नहीं करता।दूसरा पहलू ये है कि हमारी आर्थिक प्राथमिकताएं भी प्रभावित होती हैं।
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इलीट वर्ग की मर्डर स्टोरी

- फोटो : BBC
मीडिया का ध्यान राष्ट्रवादी मध्य वर्ग पर ज्यादा होता है लिहाजा हम लोग एक लाख करोड रुपए की बुलेट ट्रेन पर उस देश में गंभीरता से बात करते हैं जहां 30 करोड लोग गरीबी और अभाव में जीवन यापन करते हैं। इसकी बडी सामान्य वजह है- भारत में गरीबों की कोई आवाज नहीं होती। हमारे देश की राजनीति पर भी इस मध्य वर्ग का बहुत ज्यादा प्रभाव है। हर साल कश्मीर में अलगाववाद या फिर इस्लामी चरमपंथी हमले में होने वाली मौतों से कहीं ज्यादा लोग पूर्वोत्तर और मध्य भारत में चरमपंथी हमलों में मरते हैं। इसको लेकर स्पष्ट आंकडे भी उपलब्ध हैं। लेकिन इस्लामी खतरों पर नियमित तौर पर बहस देखने को मिलती है क्योंकि यह शहरी मध्य वर्ग की व्यग्रताओं को बढाता है।

निश्चित तौर पर माओवादियों और पूर्वोत्तर के अलगाववादियों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पडता। यही वजह है कि पाकिस्तान से सटी सीमा पर किसी सैनिक की मौत, चाहे वह दुर्घटनावश ही क्यों नहीं हुई हो, होने पर उन्हें हीरो बनाकर पेश किया जाता है। इस देश के मध्यवर्ग को सौरभ कालिया से लेकर हनुमनथप्पा तक का नाम मालूम होगा, लेकिन पूर्वोत्तर या छत्तीसगढ में मरे किसी सैनिक का नाम याद करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा। हमारे समाचार पत्रों में नियमित तौर पर नाव डूबने और मंदिर में भगदड मचने से हुई सैकडों मौत की खबर होती है।

सरकारी स्कूलों में विषाक्त भोजन से होने वाली बच्चों की मौत, नेत्र शिविर में लोगों के अंधे होने की खबर और अवैध नकली शराब पीने से हुई मौतों की भी खबर होती हैं। लेकिन यह टीवी पर बहस कराने के नजरिए से उतने महत्वपूर्ण नहीं होते, जितने नारे लगाने की घटना।मैं यहां ये भी जोडना चाहता हूं कि इन खबरों की कवरेज की तुलना किसी इलीट वर्ग से संबंधित मर्डर स्टोरी (उदाहरण के लिए शीना बोरा हत्याकांड) से करके देखिए।

अंग्रेजी भाषी मध्य वर्ग के हमलोग भारत की बहुसंख्यक आबादी के बारे में उदासीन हैं। हम केवल ये चाहतें हैं कि हमारी समस्याओं और चिंताओं पर बहस हो। बाकी सभी भारतीय अप्रासंगिक हैं। अगर यह एंटी-नेशनलिज्म नहीं है तो क्या है?अंग्रेजी के प्रभुत्व से जुडा दूसरा पहलू भी देखना चाहिए। भारतीय मध्य वर्ग की यूरोप की शास्त्रीय संस्कृति में सीमित घुसपैठ है। हम लोग केवल लोकप्रिय चीजों में दिलचस्पी रखते हैं।
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भारत में सद्भाव की कोई परंपरा नहीं!

कथक - फोटो : BBC
उदाहरण के लिए, शास्त्रीय संगीत और सद्भाव को समझे बिना यूरोपीय संस्कृति को समझना संभव नहीं है। भारत में सद्भाव की कोई परंपरा नहीं है, इसका मतलब ये है कि हम दो अलग-अलग धुनें एक ही वक्त बजा रहे हैं। जो शास्त्रीय सिम्फनी संगीत कार्यक्रम देखते हैं, उन्होंने ध्यान दिया होगा कि कोई हीरो नहीं होता है। कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आदमी कंडक्टर, कोई इस्ट्रूमेंट नहीं बजाता। वह केवल समय का ध्यान रखता है। वहां सभी संगीतकार बराबरी के होते हैं, हिंदुस्तानी और कर्नाटका संगीत में तो पदक्रम होते हैं।

इस सांस्कृतिक समानता और सद्भाव का यूरोपीय समाज के लिए क्या मतलब है? क्या यही वजह है कि यूरोपीय देश वास्तविक टीम स्पोर्ट्स फुटबॉल बेहतर ढंग से खेलते हैं? भारतीय ये नहीं जानते हैं। उनकी दिलचस्पी केवल पश्चिमी देशों में लोकप्रिय चीजों और ट्विटर तक ही सीमित है। यह ना तो गंभीर है और ना ही सार्थक।

ये सतही और व्यर्थ चीजें हैं।हां, ये सही है कि भारतीयों के लिए अंग्रेजी जानने के कई फायदे हैं। सबसे अहम फायदा आर्थिक है और यहां भी फायदा केवल मध्य वर्ग को है। लेकिन अंग्रेजी बोलने वाला मध्य वर्ग हमारे राष्ट्रीय संवाद, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे एजेंडे का जितना नुकसान कर रहा है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती।
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