डोभाल ने अपने तजुर्बे के आधार पर सुरक्षा बल को बड़ी संख्या में सड़क पर उतारने का फैसला लिया। उनकी राय थी कि इसका दोहरा मनोवैज्ञानिक असर हुआ। सुरक्षा बल की दिखने वाली मौजूदगी से शांतिप्रिय लोगों में सुरक्षा की भावना घर करती है तो उपद्रव फैलाने वालों में डर का।
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में 370 हटाने के एलान के पहले ही गली मुहल्लो तक में सैकड़ो कंपनियां तैनात कर दी गई थीं। मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले भी सिर्फ अयोध्या में अर्धसैनिक बलों की 40 कंपनियां भेज कर सड़कों को पाट दिया गया।
सूत्रों के मुताबिक डोभाल की राय पर ही सरकार की तरफ से मंदिर फैसले को किसी की हार या जीत से जोड़कर नहीं देखने के संवाद को प्रचारित किया गया। गृहमंत्री अमित शाह लगातार सक्रिय रहेऔर ज्यादातर मुख्यमंत्रियों के साथ संपर्क में रहे।
डोभाल का मानना था कि अगर सोशल मीडिया और संचार माध्यम को काबू में रखा गया तो 80 फीसदी खतरा टल जाएगा। यही वजह थी कि जम्मू-कश्मीर में पूरी संचार माध्यम को खतम कर दिया गया था। बाद में इसमें धीरे-धीरे छूट दी गई लेकिन हालात को दिन रात मॉनिटर किया जा रहा था। खुफिया विभाग की तकनीकी संस्थान नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाईजेशन (एनटीआरओ) और मल्टी एजेंसी सेंटर (मैक) दोनों मामलो में पूरी तरह भागीदार था।
राम मंदिर फैसला मामले में उत्तर प्रदेश में सोशल मीडिया पर नजर रखने केलिए कम से कम दस नए सेंटर गठित किए गए। योजना के मुताबिक किसी भी भड़काऊ पोस्ट पर फौरन कार्रवाई कर उसे पुलिस अपने ट्वीटर और फेसबुक हैंडल पर प्रचारित कर रही थी। अन्य राज्यों के चिन्हित संवेदनशील इलाकों में भी यह मॉडल अपनाया गया। गृहमंत्रालय का मानना है कि यह योजना काफी कारगर रही।