स्वच्छ वायु के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानक 10 है। वायु गुणवत्ता का आकलन करने वाले ट्रैकर ने भी प्रदूषण को कम करने के लिहाज से एनसीएपी की प्रभावशीलता को दिखाने के लिए 2017 के स्तर को आधार माना और 2019 तक इन चारों शहरों के पीएम2.5 और पीएम-10 के स्तरों का आकलन किया। इसमें पाया गया कि कोलकाता में जहां वर्ष 2018 के मुकाबले 2019 में दोनों पीएम स्तरों में करीब 24 फीसदी का सुधार किया, वहीं मुंबई ने औसतन 16 प्रतिशत और बंगलूरू ने 19.9 प्रतिशत और दिल्ली में सबसे कम 4.5 फीसदी का सुधार हुआ।
यह एनसीएपी के 2024 में निर्धारित लक्ष्य से काफी कम था। दिल्ली में 2019 में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत का स्तर 109.2 था जबकि एनसीएपी के तहत इसी साल दिल्ली में पीएम2.5 का वार्षिक औसत का स्तर 70.9 तय था। इसका अर्थ यह है कि साल 2019 में दिल्ली को एनसीएपी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए राजधानी की वायु में से प्रदूषणकारी तत्वों में 35 फीसदी की कमी लानी थी।
इसी क्रम में मुंबई में पीएम2.5 वार्षिक औसत 36.1 था, जबकि एनसीएपी के तहत वार्षिक औसत स्तर 28 लक्ष्य निर्धारित था। इसी तरह से मुंबई भी 2019 में एनसीएपी के लिए निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने में 22.4 फीसदी पीछे रह गया था। इसी क्रम में कोलकाता 16 फीसदी और बंगलूरू 12.1 प्रतिशत पीछे रह गया।
लॉकडाउन ने पर्यावरण में इंसानी दखल से होने वाली गतिविधियों के कारण हो रहे वायु प्रदूषण के प्रभावों को समझने में मदद की। जिन चार शहरों में अध्ययन किया गया, वहां पाया गया कि उन सभी में एनसीएपी के तहत 2024 तक के लिए तयशुदा लक्ष्य की दिशा में करीब 30 फीसदी तक सुधार लाने में कामयाबी मिली। कोलकाता में यह 50 फीसदी तक रहा। दिल्ली में उतना कम नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। इसकी वजह यहां चलने वाले कोयला आधारित बिजली घर रहे।
- रौनक सुतारिया, रेस्पिाइरर लिविंग साइसेंज के सीईओ
लॉकडाउन ने भारत में प्रदूषण के स्तरों की पृष्ठभूमि को समझने का मौका दिया। इस दौरान चारों शहरों में पीएम2.5 का स्तर 20-49 तक रहा जिसका अर्थ है कि यह सबसे अच्छी स्थिति है। इससे साफ जाहिर है कि हमें थोड़ी सी कवायद से बेहतर हालात मिल सकते हैं। लॉकडाउन के 74 दिनों में आए वायु प्रदूषण के स्तर में आई कमी बताती है कि देश में वायु प्रदूषण को प्रबंधन से जोड़कर स्वच्छ वायु से जुड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
- डॉ. सागिनक डे, आईआईटी दिल्ली के सीईआरसीए के समन्वयक
सभी आर्थिक गतिविधियों के रुकने से हवा की गुणवत्ता में सुधार हुआ। इसमें आए रिकॉर्ड सुधार ने साबित किया कि यदि ऐसा नहीं होता तो हमें लक्ष्य हासिल करने में पांच साल लग जाते। हवा की गुणवत्ता को प्रादेशिक मुद्दा मानकर काम किया जाए ताकि विकास और आर्थिक गतिविधियों के साथ आसमान साफ और हवा सांस लेने लायक बन सके।
- आरती खोसला, क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक