वायुसेना के फाइटर पायलटों ने अमेरिका और नाटों देशों के विश्व प्रसिद्ध युद्धाभ्यास रेड फ्लैग में हिस्सा लेने के लिए कमर कस ली है। यह दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित, अत्याधुनिक युद्ध कौशल से पूर्ण और इलेक्ट्रानिक वॉरफेयर तथा सैटेलाइट से प्राप्त सूचना के आधार पर होने वाला युद्धाभ्यास है। भारतीय वायुसेना 2008 के बाद दूसरी बार इसमें भाग लेने जा रही है।
अमेरिका के अलास्का में नेलिस वायुसैनिक अड्डे पर रेड फ्लैग जीवंत युद्ध के माहौल में होने वाला युद्धाभ्यास है। इसमें मारक क्षमता, हथियारों से लक्ष्य को साधने की शुद्धता, दुश्मन से निगाह बचाने के कौशल समेत तमाम पहलुओं पर गौर किया जाता है। शत्रु पक्ष की भी टीम होती है और तय मानदंड पर भाग लेना होता है। इस युद्धाभ्यास में अमेरिका की वायुसेना, नौसेना, सेना, मरीन कमांडो, स्पेशल फोर्सेज समेत सभी यूनिट, अत्याधुनिक फाइटर जेट तथा नाटों के सदस्य समेत करीब तीन दर्जन देश सैकड़ों लड़ाकू विमान, यूएवी व अन्य साजो-सामान के साथ शरीक होते हैं।
2008 के पहले भारतीय वायुसेना के पास अवाक्स (अरली एयरवार्न एंड कंट्रोल सिस्टम) जैसी प्रणाली नहीं थी। अवाक्स मिलने के बाद भारतीय पायलटों ने आसमान से दुश्मन के ठिकानों तथा लड़ाकू विमानों आदि के बारे में मिलने वाली सूचना के आधार पर अपने युद्धक कौशल को धार दी है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि 28 अप्रैल से 13 मई तक होने वाले युद्धाभ्यास में भारतीय टीम अपना जौहर दिखाकर लौटेगी। इस दौरान वैश्विक तकनीक को भी साझा किया जाएगा।
इस युद्धाभ्यास में वायुसेना ने 150 सदस्यों की टीम को भेजने की तैयारी की है। चार सुखाई-30 एमकेआई, चार जगुआर, अमेरिका से आए दो सी-17 ग्लोबमास्टर और हवा में विमानों को ईंधन देने वाले दो आईएल-78 विमान इसमें हिस्सा लेंगे। ये भारतीय लड़ाकू विमान, लॉजिस्टिक सपोर्ट इकाई बहरीन, मिश्र, फ्रांस, पुर्तगाल, कनाडा होते हुए अलास्का पहुंचेगी। इसकी अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें भारतीय वायुसेना को 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने होंगे।