बीते माह एम्स के बालरोग विभाग में गुर्दे से जुड़ी एक बीमारी के खिलाफ लोगों में जागरूकता लाने के लिए पर्चे बांटे जा रहे थे। करीब 12 से 14 पन्नों में बीमारी के बारे में पूरी जानकारी दी गई, लेकिन यह भी कहा गया कि जो लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं वे होम्योपैथी इत्यादि की चिकित्सीय सलाह से दूरी बनाकर रखें।
आयुष दवाओं के खिलाफ सलाह देना नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों को काफी महंगा पड़ा। बड़ी कार्रवाई से बचने के लिए डॉक्टरों को इस हरकत पर माफी मांगनी पड़ी। साथ ही भविष्य में मरीजों को ऐसी सलाह नहीं देने का वादा भी करना पड़ा। इसे लेकर एम्स प्रबंधन ने सभी विभागों के साथ चिंता व्यक्त करते हुए एलोपैथी बनाम दूसरी चिकित्सा पैथी में नहीं पड़ने की चेतावनी भी दी है।
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बीते माह एम्स के बालरोग विभाग में गुर्दे से जुड़ी एक बीमारी के खिलाफ लोगों में जागरूकता लाने के लिए पर्चे बांटे जा रहे थे। करीब 12 से 14 पन्नों में बीमारी के बारे में पूरी जानकारी दी गई, लेकिन यह भी कहा गया कि जो लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं वे होम्योपैथी इत्यादि की चिकित्सीय सलाह से दूरी बनाकर रखें। साथ ही यूनानी चिकित्सा के बारे में भी दूरी बनाने के लिए कहा क्योंकि इनका मानना है कि इन दवाओं में भारी तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है जो किडनी के लिए लाभदायक नहीं है।
एम्स प्रबंधन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी बताया कि तीमारदार और मरीजों में बंटी इस बुकलेट में एम्स के अलावा दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में प्रैक्टिस कर रहे वरिष्ठ डॉक्टर का भी नाम प्रकाशित था, जिसे लेकर प्रबंधन ने भी नाराजगी व्यक्त की है। इसी पर्चे के बारे में जब राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग को सूचना मिली तो बीते 23 फरवरी को एम्स निदेशक डॉ.रणदीप गुलेरिया को पत्र लिख आयोग ने सवाल खड़े करते हुए तत्काल संज्ञान लेने की मांग की।
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आयोग के सचिव डॉ. तारकेश्वर जैन ने विभाग की इस गतिविधि को लेकर प्रबंधन की ओर से कार्रवाई करने के लिए कहा। इसी के चलते प्रबंधन ने संबंधित डॉक्टरों से सवाल किए तो उन्हें लिखित में आयोग से माफी मांगनी पड़ी। 26 फरवरी को एम्स के डॉक्टरों ने माफी मांगते हुए इसे एक त्रुटि माना है और बताया कि हिंदी और इंग्लिश भाषा के बुकलेट में से इसे हटा लिया गया है। साथ ही भविष्य में फिर से इस तरह की त्रुटि नहीं दोहराने का विश्वास भी दिलाया है।