देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू
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नेहरू और आंबेडकर ने की थी कोशिश
आजादी के बाद जब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पहले कानून मंत्री बीआर आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता लागू करने की बात की, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। जब आंबेडकर ने इस कानून को अपनाने की बात कही, तो कुछ सदस्यों ने उनका विरोध किया।
हिंदू कोड बिल तक सीमित
नेहरू को भारी विरोध के चलते हिंदू कोड बिल तक ही सीमित रहना पड़ा था और संसद में वह केवल हिंदू कोड बिल को ही लागू करवा सके, जो सिखों, जैनियों और बौद्धों पर लागू होता है।
इस बिल में द्विपत्नी और बहुपत्नी प्रथा को समाप्त किया गया। साथ ही, महिलाओं को तलाक और उत्तराधिकार का अधिकार मिला। विवाह के लिए जाति को अप्रासंगिक बनाया गया। आंबेडकर भी समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे, लेकिन जब उनकी सरकार यह काम न कर सकी तो उन्होंने पद छोड़ दिया था।
आधुनिक देशों में लागू
दुनिया के अधिकतर आधुनिक देशों में ऐसा कानून लागू है। इस कानून के तहत व्यक्तिगत स्तर, संपत्ति के अधिग्रहण और संचालन का अधिकार, विवाह, तलाक और गोद लेने जैसे मामलों में सभी धर्म के व्यक्ति पर समान कानून लागू होता है।
भारत का संविधान राज्य के नीति निर्देशक तत्व में सभी नागरिकों को समान नागरिकता कानून सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। वहीं इस तरह का कानून अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका है। महज गोवा अकेला ऐसा राज्य है जहां इस तरह का कानून लागू है।
अब क्या है स्थिति?
अब ये कहा जा रहा है कि मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए 'द मुस्लिम वुमेन एक्ट 2019' लाया गया है। ऐसे में इन्हें और सशक्त करने के लिए समान नागरिक संहिता की जरूरत है।