अफगानिस्तान की पहली गैर-मुस्लिम महिला सांसद अनारकली कौर होनारियार विस्थापन का दर्द बयां करते हुए कहती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि देश छोड़ना पड़ेगा। हालांकि, काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद ऐसे हालात में देश छोड़ना पड़ा कि मातृभूमि की स्मृति के रूप में एक मुट्ठी मिट्टी तक साथ लाने का मौका तक नहीं मिला।
वे रविवार सुबह भारतीय वायुसेना के सी-17 विमान से परिवार सहित भारत पहुंची। फिलहाल, दिल्ली के एक होटल में बीमार मां के साथ ठहरीं हैं। वे बताती हैं कि अफगानिस्तान के लोगों का भविष्य अनिश्चय में है। लोग इतने हताश हैं कि अफगानिस्तान से बाहर निकलने के लिए जान की परवाह किए बिना हवाई जहाज पर बसों की तरह चढ़ रहे हैं। पेशे से डेंटिस्ट 36 वर्षीय होनिरियार का सपना लोकतांत्रिक व प्रगतिशील अफगानिस्तान में जीने का था, जिसके लिए उन्होंने वहां के घोर रूढि़वादी पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के हितों का समर्थन किया।
होनारियार कहती हैं- हालांकि, मेरा सपना तो टूट चुका है, लेकिन उम्मीद करती हूं कि अफगानिस्तान में जो भी सत्ता संभाले वह बीते 20 वर्ष में हुई तरक्की को सहेजे। वे कहती हैं कि भले ही तालिबान कह रहा हो कि वह शांति कायम करेगा, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि है कि महिलाओं को सम्मानजनक तरीके से जीने का मौका मिलेगा।
मानवाधिकाराें के लिए काम करती रही हैं अफगान सांसद
मई 2009 में, रेडियो फ्री यूरोप के अफगान चैप्टर के तहत होनारियार को पर्सन ऑफ द ईयर चुना गया था, जिससे उन्हें वहां खासी लोकप्रियता मिली। अफगान मानवाधिकार आयोग के लिए काम करते हुए किए दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों के दौरों के अनुभव साझा करते हुए वे कहती हैं कि दुसरे धर्म की होने के बाद भी मुस्लिम महिलाएं उनपर यकीन करती थीं।
अफगानिस्तान में फंसे अपने सहकर्मियों को लेकर होनारियार कहती हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा पीछे छूट गए लोगों कैसे बताएं कि वे उनकी बहुत फिक्र करती हैं। वे कहती हैं कि उनके विचार और सिद्धांत तालिबान से पूरी तरह अलग हैं, तालिबान के खिलाफ उन्होंने बहुत कुछ बोला है। हालांकि, वे दिल्ली में रहकर अफगानिस्तान के लिए काम करने की इच्छुक हैं।