एनएसए डोभाल और रूसी एनएसए पेत्रुशेव की चर्चा का मुख्य बिंदु क्षेत्रीय सुरक्षा ही था। समझा जा रहा है कि इस बैठक में देश के प्रमुख सुरक्षा अधिकारी भी शामिल थे। चर्चा में अफगानिस्तान के बदल रहे हालात का असर भारत पर पड़ने, पाकिस्तान के आतंकी संगठनों की सक्रियता बढ़ने, जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा पर आतंकी घुसपैठ बढ़ने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। रूस के एनएसए ने भी अपने दृष्टिकोण से अवगत कराया।
बागची बोले- धीरे-धीरे धुंध छंटेगी
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि रूस के खुफिया और सुरक्षा प्रमुख भारत आए हैं। इनसे चर्चा हुई है। भारत ने द्विपक्षीय, क्षेत्रीय अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिति को लेकर अपना पक्ष रखा है। रूस के सुरक्षा प्रमुख ने अपनी बात रखी है। अफगानिस्तान को लेकर भी चर्चा हुई है। बागची कहते हैं कि अभी स्पष्ट तौर पर कुछ कहना मुश्किल है। मेरे विचार में कुछ समय इंतजार करना चाहिए। धीरे-धीरे धुंध हटती जाएगी। स्थिति साफ होती जाएगी।
अमेरिका ने जहां अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाया है, काबुल में दूतावास को बंद किया है, वहीं रूस, चीन के दूतावास काबुल में यथावत अपना काम कर रहे हैं। चीन, रूस, तुर्की, पाकिस्तान को तालिबान प्रशासन के साथ काम करने में न तो दिक्कत है और न ही मान्यता देने में कोई हिचक जैसी स्थिति। इसके समानांतर पश्चिमी देशों और भारत ने भी अपने काबुल स्थित दूतावास का काम कतर की राजधानी दोहा में शिफ्ट कर दिया है। अमेरिका के सामने भी दक्षिण एशिया और एशिया में अपने हितों के रक्षा की चुनौती खड़ी है। इसे साधने के लिए अमेरिकी प्रशासन के अधिकारियों ने भारत के साथ पाकिस्तान के दौरे बढ़ा दिए हैं। भारतीय रणनीतिकारों का कहना है कि अफगानिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर रूस और अमेरिका की दिशा फिर अलग-अलग चल रही है। इसके समानांतर 'न काहू से दोस्ती और न काहू से बैर' की रणनीति पर चलकर भारत की चुनौती नीतिगत संतुलन बनाकर आगे बढ़ना है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अफगानिस्तान को लेकर भारत की नीति को कई बार स्पष्ट किया है। बागची के अनुसार भारत शांतिपूर्ण, स्थायी अफगानिस्तान चाहता है। गौरतलब है कि अमेरिका के अफगानिस्तान में सेना उतारने के बाद भी भारत की यही नीति थी। भारत ने वहां बांध, स्कूल, सड़क, संसद बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।
दोहा में भारतीय राजदूत दीपक मित्तल से भेंट के दौरान भी तालिबान के नेता ने भारत से इस सहयोग को जारी रखने की अपील की थी। विदेश नीति के जानकार कहते हैं कि तालिबान की सरकार के साथ किसी तरह का कटुता का सवाल नहीं है। किसी भी तरह के दोस्ताना संबंध के बारे में सोचना और कहना दोनों अनुचित है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत अभी मित्र देशों के माध्यम से और कूटनीति, रणनीति के जरिए तटस्थ संबंध बनाए रखने का पक्षधर है।