अध्ययन के दौरान जब साल 2011-12 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया तो उससे पता चला कि सरकार ने दवाईयों और स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चे को कम करने के लिए कई उपाय किए थे। इस अध्ययन से यह भी पता चला कि ड्रग कीमत नियंत्रण ऑर्डर 2013 ने महत्वपूर्ण दवाओं को मूल्य नियंत्रण के तहत आवश्यक दवाओं की सूची में डाला। सरकार द्वारा कई स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को शुरू करने के बावजूद भी देश की अधिकांश आबादी ने अस्पतालों में इलाज और दवाओं की खरीद पर अत्यधिक व्यय करना जारी रखा।
वहीं सरकार ने लोगों को कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने हेतु जन औषधि स्टोर्स की शुरुआत की। इसके तहत करीब 3,000 स्टोर खोलने का लक्ष्य रखा गया था जो पूरा भी हो गया लेकिन ये पहल भी लोगों के लिए उतनी सहायक नहीं हो पाई जितना सोचा गया था। या तो यहां अधिकतर दवाइयों का स्टॉक नहीं होता है या फिर जो दवाइयां मिलती हैं उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होती।
अधिकांश जन औषधि स्टोर्स में 100-150 तरह की दवाइयां ही मौजूद होती हैं जबकि कहा गया था कि यहां 600 से अधिक दवाईयां उपलब्ध होंगी। भारत में मौजूद 5.5 लाख से अधिक फार्मेसी की तुलना में इनकी संख्या बेहद ही कम है।