तालिबान के पहले की तरह खूंखार होने की संभावना कम
भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को तालिबान के कुछ बदले-बदले से होने की संभावना दिखाई दे रही है। माना जा रहा है कि पिछले 20 साल के दौरान तालिबान के नेताओं ने काफी कुछ सीखा है। उन्हें कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय रिश्ते के महत्व का भी अंदाजा होना चाहिए। इसलिए तालिबान के दूसरे कार्यकाल में उनके बहुत खूंखार होने की संभावना कम है। एक राजनयिक का कहना है कि फिलहाल वह सधा बयान दे रहे हैं। उम्मीद है कि जी-7 की बैठक के बाद काफी कुछ स्थितियां साफ होंगी। सूत्र का कहना है कि तालिबान के नेताओं ने सभी को साथ लेकर चलने, अफगानिस्तान में निर्माण कार्यों को चोट न पहुंचाने और किसी से बदला न लेने के संकेत दिए हैं। तालिबान के नेताओं ने कहा है कि वह इस्लामिक अमीरात के पक्ष में हैं, लेकिन मानवाधिकार का पालन करेंगे। इसलिए बहुत अधिक घबराने की आवश्यकता नहीं है।
वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान शासन का लौटना चिंता की बात है, लेकिन बहुत घबराने की जरूरत नहीं है। एनबी सिंह कहते हैं कि अमेरिका के वहां से मैदान छोड़कर भाग जाने के बाद निश्चित रूप से तालिबान का हौसला बढ़ा है, लेकिन अफगान नेताओं ने साफ कहा है कि वह भारत के साथ मिलकर काम करने के पक्ष में हैं। हालांकि एयर वाइस मार्शल का कहना है कि अफगानिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा, लश्कर-ए-जांगवी, जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का नेटवर्क सक्रिय है। बताते हैं कि हक्कानी नेटवर्क के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से करीबी रिश्ते जगजाहिर हैं। इस तरह से पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क के तार तालिबान के नेताओं से जुड़े होने के संकेत हैं। हालांकि विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि अभी इस बारे में कुछ भी कहने से पहले थोड़ा इंतजार करना अच्छा रहेगा।