दूसरों की नि:स्वार्थ सेवा करना क्या होता है, ये अगर जानना है तो सेवा भारती से जुड़े उन चिकित्सकों से सीखा जा सकता है, जिन्होंने सुख-सुविधा छोड़ वनवासी क्षेत्रों में जरूरतमंदों की मदद में सालों गुजार दीं। वो भी बिना किसी चाहत के।
कड़ी धूप में पैदल चलना, खुले आसमान के नीचे रात गुजारना, कभी खाली पेट सोना तो कभी दो घूंट पानी के लिए भटकना। इतना ही नहीं, स्वयंसेवक उग्रवादियों की धमकी के बाद भी निरंतर सेवा कार्य में जुटे हैं।
कमला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में सेवा भारती के आरोग्य रक्षक/मित्र की दो दिवसीय कार्यशाला में ऐसे ही तमाम चिकित्सक भाग लेने आए। इनमें से एक हैं लातूर, महाराष्ट्र निवासी लगभग 70 वर्षीय डा. अशोक कुकड़े।
वह और उनकी पत्नी ज्योत्सना दोनों एमएस करने के बाद से दुर्गम क्षेत्रों के लोगों को चिकित्सा उपलब्ध कराने में जुट गए। उन्होंने मराठवाड़ा का वह क्षेत्र चुना, जहां सामान्य तौर पर चिकित्सा सुविधा पहुंचने में घंटों लग जाते हैं।