मीराबाई चानू को प्रशिक्षण के लिए ट्रक में बैठकर इंफाल तक आना पड़ा तो वहीं रेसवॉकर संदीप पुनिया को बकरी चराते हुए अपना अभ्यास करना पड़ा है। उन्होंने कहा, प्वाइंट तो दर्जनों हैं, लेकिन असल कारणों को नौ बातों में समेटने का प्रयास करेंगे। खेल फेडरेशन, चयन प्रक्रिया, कोच की नियुक्ति, गुटबाजी, भ्रष्टाचार, खुन्नस और कई दूसरी बातें मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों को आगे आने ही नहीं देती हैं। रविवार को अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विशेष बातचीत करते हुए ओमप्रकाश ने कहा, आप यह भी देखें कि भारत में किन खिलाड़ियों को कब और किस अवस्था में मौका मिलता है। खिलाड़ियों को तैयार करने में सरकार का कितना हाथ रहता है। करोड़ों अरबों रुपयों वाले खेल संघ, पांच साल क्या करते रहते हैं। केवल खिलाड़ी को ही मेडल की भूख क्यों रहती है। क्या वह अपनी गरीबी से निजात पाना चाहता है।
गांव वाले या कोई संस्था खिलाड़ी के खाने का खर्च उठाती है। भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) क्या करता है। आज तक कितने ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने साई में रहते हुए ओलंपिक में पदक जीता है। चीन में 12 वर्ष की आयु में बच्चे को सरकार ले लेती है। उसके खेल और ट्रेनिंग की प्लानिंग करती है। नतीजा, 18 से 22 साल के बीच वे खिलाड़ी पदक भी झटक लेते हैं। भारत में अधिकांश खिलाड़ियों को अपनी गरीबी और खेल संघों की राजनीति से लड़कर आगे आना पड़ता है। खिलाड़ियों के पास खुद की किट तक नहीं होती। साथी खिलाड़ियों का सामान मांगकर अभ्यास करनी पड़ता है। ऐसे में ओलंपिक से पदकों का अंबार लगेगा, ये सोचना बेमानी है।