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Gujarat: राज्यपाल की कुलाधिपति के तौर पर नियुक्ति के विरोध में गुजरात विद्यापीठ के 9 न्यासियों ने दिया इस्तीफा

Tue, 18 Oct 2022 04:13 AM IST
देव कश्यप पीटीआई, अहमदाबाद।

सार

अहमदाबाद स्थित विश्वविद्यालय के शीर्ष निर्णय लेने वाले निकाय ने न्यासियों के इस्तीफे स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है। एक संयुक्त बयान में नौ न्यासियों ने कहा कि देवव्रत का कुलाधिपति के रूप में नियुक्ति "बेहद राजनीतिक दबाव" में किया गया है और यह "महात्मा गांधी के मूल्यों, तरीकों और प्रथाओं की पूर्ण अवहेलना" है।
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गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत। - फोटो : Twitter@ADevvrat
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विस्तार
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गुजरात विद्यापीठ के न्यासी बोर्ड के नौ सदस्यों ने सोमवार को कहा कि उन्होंने राज्य के राज्यपाल आचार्य देवव्रत को महात्मा गांधी द्वारा 1920 में स्थापित डीम्ड विश्वविद्यालय का नया कुलाधिपति नियुक्त किए जाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने इस नियुक्ति में ‘‘अनुचित जल्दबाजी’’ किए जाने और ‘‘राजनीतिक दबाव’’ होने का आरोप लगाया।

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हालांकि, अहमदाबाद स्थित विश्वविद्यालय के शीर्ष निर्णय लेने वाले निकाय ने न्यासियों के इस्तीफे स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है। यहां एक संयुक्त बयान में नौ न्यासियों ने कहा कि देवव्रत का कुलाधिपति के रूप में नियुक्ति "बेहद राजनीतिक दबाव" में किया गया है और यह "महात्मा गांधी के मूल्यों, तरीकों और प्रथाओं की पूर्ण अवहेलना" है। देवव्रत ने 102 साल पुराने संस्थान के 12वें कुलाधिपति का प्रभार संभालने के लिए 11 अक्तूबर को सहमति जताई थी। विश्वविद्यालय की संचालन परिषद ने चार अक्तूबर को उन्हें प्रसिद्ध कार्यकर्ता और गांधीवादी मौजूदा इला भट्ट (89) के उम्र से संबंधित मुद्दों के कारण इस्तीफे देने के बाद पांच साल के लिए पद संभालने के लिए आमंत्रित किया था। 

गुजरात विद्यापीठ की संचालन परिषद, जो इसकी सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, ने एक बयान में कहा कि आठ ट्रस्टियों (नौवां सदस्य आजीवन ट्रस्टी है) के इस्तीफे को स्वीकार नहीं करने के लिए सोमवार को परिषद की बैठक में एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया गया। संस्थान ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि नरसिंहभाई हाथीला, जो आजीवन ट्रस्टी हैं और उन नौ ट्रस्टियों द्वारा जारी संयुक्त बयान के हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक हैं उन्होंने भी इस्तीफे को स्वीकार नहीं करने के गवर्निंग काउंसिल के फैसले को भी मंजूरी दे दी है ताकि संस्थान को उनका मार्गदर्शन लंबे समय तक मिलता रहे।
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विरोध में नौ न्यासियों ने एक खुले पत्र में कहा था कि देवव्रत का कुलाधिपति के रूप में नियुक्ति "न तो स्वाभाविक है और न ही न्यासी बोर्ड का सर्वसम्मत निर्णय है।" उन्होंने कहा कि यह बेहद राजनीतिक दबाव में किया गया है। यह गांधी के मूल्यों, तरीकों और प्रथाओं की पूरी तरह से अवहेलना है। उन्होंने राज्यपाल से अपील की कि वे "लोकतंत्र के मौलिक मूल्यों और विश्वविद्यालय के पारदर्शी स्वायत्त निर्णय लेने की क्षमता को बनाए रखने के लिए कुलाधिपति के रूप में कार्यभार ग्रहण करने से इनकार करें। 

न्यासी नरसिंहभाई हाथीला, सुदर्शन अयंगर, अनामिक शाह, मंडबेन पारिख, उत्तमभाई परमार, चैतन्य भट्ट, नीताबेन हार्डिकर, माइकल मझगांवकर और कपिल शाह ने संयुक्त बयान में कहा कि आपसे हमारा विनम्र अनुरोध काफी विचार-विमर्श के बाद सामूहिक विवेक से लिया गया फैसला है। हम निश्चित रूप से आपके व्यक्तित्व खिलाफ नहीं हैं। न्यासियों ने कहा कि नए कुलाधिपति की नियुक्ति को लेकर जो हुआ वह चौंकाने वाला था।

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