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25 Years Of Kargil: पिता ने वापस भेज दी थी शहीद बेटे की चिता की राख, अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था हस्तक्षेप

सार

खुमताई में जिंटू के अंतिम संस्कार के बाद, उनके पिता ने अपने बेटे की राख का एक हिस्सा युद्ध के मैदान में वापस भेज दिया। गोगोई चाहते थे कि इनके बेटे की राख को काला पत्थर पर बिखेर दिया जाए।
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25 Year Of Kargil - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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करगिल युद्ध के 25वें विजय दिवस पर, राष्ट्र उन बहादुर सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को याद कर रहा है, जिन्होंने 1999 में करगिल जंग के दौरान अपने अटूट बहादुरी का प्रदर्शन किया था। यह दिन हमारे देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनकी बहादुरी और समर्पण की याद दिलाता है। साथ ही, उन परिवारों के लिए भी संवेदना व्यक्त करने का वक्त है, जिन्होंने जंग के दौरान अपने बच्चों और पिता के खोने का अपार दर्द सहा, फिर भी वे देश के लिए मजबूती से खड़े रहे। इन्हें में से एक थे असम के रहने वाले कैप्टन जिंटू गोगोई। जिन्होंने करगिल युद्ध के दौरान बटालिक में काला पत्थर पर पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। वहीं उनके लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी व्यक्तिगत तौर पर  हस्तक्षेप किया था। 

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दुश्मन के सामने नहीं किया सरेंडर
29 जून 1999 की रात को कैप्टन जिंटू गोगोई को बटालिक सब-सेक्टर के जुबेर हिल क्षेत्र में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास काला पत्थर की रिज लाइन से दुश्मनों को खदेड़ने का काम सौंपा गया था। वे इस कार्रवाई में शहीद हो गए और उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। असम के खुमताई गांव (गोलाघाट जिले) के रहने वाले उनके पिता मानद फ्लाइंग ऑफिसर थोगीराम गोगोई बताते हैं कि उन्हें अपने बेटे की मौत की खबर 2 जुलाई 1999 को मिली थी। जब जंग छिड़ने की खबर आई, तो कैप्टन जिंटू छुट्टी पर थे। उनकी 12 दिन पहले ही सगाई हुई थी। वे युद्ध शुरू होने से ठीक पहले उत्तरी कश्मीर के केरन सेक्टर में अपनी सेवाएं दे चुके थे, इसलिए उनकी बटालियन को दुश्मनों को खदेड़ने के लिए भेजा गया था। भारी गोलाबारी का सामना करने के बावजूद वे अपनी टीम के साथ सुबह-सुबह चोटी पर पहुंच गए। उन्हें तुरंत दुश्मनों ने घेर लिया। कैप्टन गोगोई को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया, लेकिन अपनी रेजिमेंट के आदर्श वाक्य, "युद्धया कृत निश्चय (दृढ़ संकल्प के साथ लड़ो)" को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने रेजिमेंटल युद्ध के नारे, "बद्री विशाल लाल की जय (भगवान बद्री नाथ के पुत्रों की विजय)" के साथ दुश्मन सैनिकों पर धावा बोल दिया। उन्होंने सर्वोच्च बलिदान देने से पहले दुश्मन पर गोलियां चलाईं और दो पाकिस्तानी  सैनिकों को ढेर कर दिया। उनके वीर चक्र प्रशस्ति पत्र में लिखा है, "कैप्टन जिंटू गोगोई ने सबसे दुर्गम इलाके में दुश्मन का सामना करते हुए बहादुरी का सबसे विशिष्ट कार्य, कर्तव्य के प्रति अद्वितीय समर्पण और असाधारण स्तर का नेतृत्व प्रदर्शित किया और भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपरा में सर्वोच्च बलिदान दिया।"



बचपन से ही थीं फौजियों वाली आदतें
कैप्टन जिंटू गोगोई का जन्म 21 नवंबर 1970 को कानपुर के वायुसेना अस्पताल में हुआ था। उनके पिता खुद 1962, 1965 और 1971 युद्ध में हिस्सा ले चुके हैं। परिवार में जिंटू के अलावा दो बहनें और हैं। अपने बेटे के शुरुआती दिनों को याद करते हुए गोगोई कहते हैं, जिंटू बचपन से ही बहुत अनुशासित था। मेरी वर्दी उसे भाती थी। उसने फौजियों वाली कुछ आदतें अपना ली थीं, जिसमें अपनी स्कूल यूनिफॉर्म का ख्याल रखना, जूते पॉलिश करना और समय का पाबंद रहना शामिल था। बाद में वह नेशनल कैडेट कोर (एनसीसी) में भी शामिल हो गया। हालांकि वह एक होनहार छात्र नहीं था, लेकिन बैडमिंटन, टेबल टेनिस और फुटबॉल में वह अव्वल था। सोशल वेलफेयर स्टडीज में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद, वह 1994 में, अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए) में शामिल हो गए। मार्च 1995 में, SS 59 कोर्स में उन्हें 17 गढ़वाल राइफल्स की प्रतिष्ठित बटालियन में कमीशन मिला। 
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12 दिन बाद निकाला गया शव
बटालिक की 16,165 फीट ऊंची चोटी काला पत्थर (केपी)--- प्वाइंट 4927 पर गोगोई को सोलर प्लेक्सस में मशीन गन से गोली लगी, लेकिन वे तब तक फायरिंग करते रहे जब तक वे गिर नहीं गए। वे जख्मी हो गए, और उनका शव जुबार टॉप पर पिकेट से बमुश्किल 150 गज की दूरी पर मिला। उनका शव चट्टानों से नीचे गिर गया था। लगभग 12 दिन बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के बाद उनके पार्थिव शरीर को वहां से निकाला गया। इस पूरे ऑपरेशन के दौरान कैप्टन जिंटू गोगोई के अलावा 17 गढ़वाल राइफल के ग्यारह अन्य सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी।



बेटे की राख को काला पत्थर पर बिखेरी
खुमताई में जिंटू के अंतिम संस्कार के बाद, उनके पिता ने अपने बेटे की राख का एक हिस्सा युद्ध के मैदान में वापस भेज दिया। गोगोई चाहते थे कि इनके बेटे की राख को काला पत्थर पर बिखेर दिया जाए। जिंटू की बटालियन उस वक्त बटालिक की ऊंचाइयों पर तैनात थी। जिंटू की राख लाल कपड़े में बंधे एक मटके में उनके बटालियन को भेजा। जहां उस समय जिंटू के साथी रहे लेफ्टिनेंट ऋषि सिंह ने उनकी राख को काला पत्थर की मिट्टी में बिखेर दिया। उनके पिता टीआर गोगोई खुद काला पत्थर जाना चाहते थे और अपने बेटे की आत्मा को श्रद्धांजलि देना चाहते थे। लेकिन वृद्ध गोगोई के लिए यह मुश्किल था। 2023 में एक अभियान के दौरान कुछ सैनिक काला पत्थर पर चढ़े, और वहां की मिट्टी एकत्र की और इसे कलश पर लाल कपड़ा बांध कर गोगोई को भेज दिया। उनके पिता अब उस मिट्टी का एक हिस्सा, खुमताई में बन रहे जिंटू के नए स्मारक पर छिड़कना चाहते हैं। 



पार्थिव शरीर लेकर असम पहुंची मंगेतर
टीआर गोगोई बताते हैं कि जिंटू की मंगेतर, जिनसे उनकी शादी होने वाली थी, वह ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) में प्रस्तोता थीं। 2 जून 1999 को उनकी सगाई हुई थी, और 30 जून को जिंटू की मौत की खबर आ गई। जिस खुमताई गांव में वे दुल्हन बन कर आने वाली थीं, उस गांव में वे जिंटू का पार्थिव शरीर लेकर पहुंची। उन्होंने उसके बाद किसी और से शादी करने से इनकार कर दिया। काफी समझाने-बुझाने के बाद वह शादी के तैयार हुईं और सॉफ्टवेयर इंजीनियर से शादी कर ली। वहीं उनकी बेटी भी उस दिन पैदा हुई, जिस दिन जिंटू का जन्मदिन होता था। वह कहते हैं कि घर में जिंटू की कमी अभी भी महसूस होती है। घर में वह खालीपन अभी भी महसूस होता है।

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