केंद्र सरकार ने मंगलवार को यह स्वीकार किया कि देश की करीब 25 फीसदी आबादी सूखे से पीड़ित है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मनरेगा के तहत वर्ष 2016-17 केलिए अब तक करीब 19000 करोड़ रुपये जारी कर दिए गए हैं। साथ ही सरकार ने यह भी बताया कि 11 राज्यों में मनरेगा के तहत काम करने वालों को उनकी मजदूरी सीधे उनके खाते में पहुंचाने का काम शुरू हो चुका है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल(एएसजी) पीएस नरसिंहा ने न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति एनवी रमण की पीठ के समक्ष कहा कि देश में करीब 33 करोड़ लोग सूखे से प्रभावित है।
हालांकि उन्होंने एक बार फिर से स्पष्ट किया कि सूखाग्रस्त प्रांत घोषित करने का अधिकार पूरी तरह से राज्य का है। केंद्र सरकार की भूमिका महज सलाहकारी है। एएसजी ने कहा कि केंद्र का काम मनरेगा केलिए फंड जारी करना है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2016-17 के लिए इस मद अब तक करीब 195000 करोड़ रुपये जारी कर दिए गए हैं। इनमें से 7331 करोड़ रुपये तो सोमवार को जारी किए गए हैं। इस वित्त वर्ष में सरकार को करीब 38500 करोड़ रुपये जारी करने हैं।
मालूम हो कि देश के660 जिलों में से 256 जिले सूखाग्रस्त हैं। केंद्र सरकार ने इन जिलों में जनसंख्या केआंकड़ों को देखते हुए 33 करोड़ लोगों को सूखे से ग्रस्त होने की बात कही है। अब तक 11 राज्यों ने खुद को सूखाग्रस्त इलाका घोषित कर दिया है।
एएसजी ने कहा कि सरकार यह प्रयास कर रही है कि मनरेगा के तहत काम करने वाले कामगारों को उनकी मजदूरी जल्द मिले। प्रयास किया जा रहा है कि उन्हें मजदूरी एक हफ्ते में मिल जाए।
अधिक से अधिक 15 दिनों में उन्हें मजदूरी मिल ही जाए। एएसजी ने बताया कि सरकार ने कामगारों की मजदूर उनके खाते में डालने का काम शुरू कर दिया है। नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनजमेंट सिस्टम के तहत मनरेगा के तहत काम करने वाले कामगारों को सीधे उनके खाते में मजदूरी पहुंचाने का निर्णय लिया गया है। अब तक 11 राज्यों में इसके तहत कामगारों को उनकी रकम खाते में पहुंचाई जा रही है।
शीर्ष अदालत स्वराज अभियान नामक संगठन द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने पीठ को फसलों की क्षति होने पर किसानों को मिलने वाले मुआवजे की ओर ध्यान दिलाया।
उन्होंने कहा कि किसानों को फसलों की क्षति होने पर 13500 रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा दिया जाता है, जो बेहद ही कम है। उन्होंने कहा कि फसल की क्षति न होने की स्थिति भी किसान बमुश्किल अपना गुजर-बसर कर पाते हैं।