प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल उस दौरान शुरू हुआ, जब ढाई साल से जारी रूस-यूक्रेन संघर्ष और इस्राइल-हमास के बीच तनाव अपने चरम पर है। पश्चिमी देशों समेत पूरी दुनिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद लगाए बैठी है कि बतौर शांतिदूत वे संघर्षों को खत्म करने और दुनिया में शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएंगे। संयोग से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन भी और उनकी सरकार के 100 दिन भी पूरे हो रहे हैं। पूरे विश्व में प्रधानमंत्री मोदी के बढ़ते कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की भी मान चुके हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकता है। 'तटस्थ' रहने वाला भारत अब 'मध्स्थ' की भूमिका में आ रहा है। वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया की भू-राजनीति में भी भारत का कद बढ़ा है।
2014 से विदेश नीति में हुए बदलाव
26 मई, 2014 को अपने कार्यकाल के पहले शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने सभी सार्क देशों समेत मॉरीशस के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को आमंत्रित करके प्रतीकात्मक तौर पर सही, लेकिन अपनी रणनीतिक विदेश नीति का परिचय दे दिया था। प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल में सबसे पहले उठाए गए कदमों में से 'पड़ोसी पहले' नीति की शुरुआत की थी, जिसने भारत की क्षेत्रीय कूटनीति के लिए माहौल तैयार किया। अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी इटली में जी-7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। संघर्ष के दौरान रूस और यूक्रेन की महत्वपूर्ण यात्राएं कीं। केंद्र सरकार की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत ब्रुनेई की पहली द्विपक्षीय यात्रा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने। वहीं, उन्होंने इसी नीति के तहत सिंगापुर, वियतनाम की यात्रा भी की।
जी-7 के मंच को ऐसे भुनाया पीएम मोदी ने
मोदी 3.0 की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने 13-15 जून को इटली के अपुलिया में 50वे जी-7 शिखर सम्मेलन में भागीदारी की और दुनिया के प्रमुख नेताओं के साथ द्वीपक्षीय वार्ता की। जी7 का सदस्य न होने के बावजूद उनकी इस यात्रा को कूटनीतिक नजरिए से काफी सफल माना गया। पीएम मोदी ने इस मौके का इस्तेमाल कूटनीतिक बढ़त के रूप में करते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की, इतालवी प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, जर्मन चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ के साथ द्विपक्षीय बैठक की। साथ ही, उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला, यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान समेत कई नेताओं से संक्षिप्त मुलाकात की।
भारत-रूस की दोस्ती आज भी बरकरार
पीएम मोदी 8 जुलाई को 22वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निमंत्रण पर रूस पहुंचे थे। जहां पीएम मोदी ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ वार्ता की, और व्यापार और रक्षा सौदों सहित द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं पर चर्चा की। इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी को रूस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द एपोस्टल से भी सम्मानित किया गया। अपनी रूस यात्रा से पीएम मोदी ने अमेरिका समेत यूरोपीय देशों को संदेश दिया कि भारत-रूस की दोस्ती आज भी उतनी ही मजबूत है, जितनी पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान रही है। यही नहीं उन्होंने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के सामने साफ-साफ कहा कि यह समय युद्ध का नहीं है। वहीं, इस यात्रा के पीएम मोदी ऑस्ट्रिया भी गए, जो 40 वर्षों बाद यह किसी भारतीय पीएम की पहली यात्रा थी। इससे पहले इंदिरा गांधी ने ऑस्ट्रिया की यात्रा की थी।
पीएम मोदी ने ऐसे साधा पोलैंड को
इसके बाद 21 अगस्त को पीएम मोदी 21 से 23 तक पोलैंड और यूक्रेन की यात्रा पर पहुंचे। 45 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने पोलैंड का दौरा किया। यूक्रेन के पड़ोसी पोलैंड से वारसॉ संधि का हिस्सा बनने तक भारत के संबंध काफी मुधर रहे। इस दौरान 1955 से 1979 तक तीन प्रधानमंत्रियों ने पोलैंड का दौरा भी किया। भारत के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू 25 जून 1955 को पोलैंड गए थे। इसके बाद इंदिरा गांधी 8 अक्टूबर 1967 ने दौरा किया और फिर मोरारजी देसाई 14 जून 1979 को पोलैंड यात्रा पर जाने वाले आखिरी भारतीय प्रधानमंत्री थे। लेकिन जैसे ही वारसॉ संधि कमजोड़ पड़ी दोनों देशों के संबंधों में दूरियां आ गईं। जिसकी वजह भारत की रूस से दोस्ती थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इस यात्रा से न केवल पोलैंड को साधा, बल्कि पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के साथ बातचीत में इशारों-इशारों में रूस और यूक्रेन को भी संदेश दे दिया।
भारत तटस्थ नहीं, बल्कि शांति के पक्ष में
अपनी पोलैंड यात्रा के बाद प्रदानमंत्री मोदी 22 अगस्त को कीव की यात्रा पर रवाना हुए। इस यात्रा पर पूरी दुनिया की निगाहें थीं। यूक्रेन की स्थापना के बाद लगभग 30 सालों बाद यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। भारत ने इस यात्रा के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश की। पीएम मोदी के इस दौरे का असर क्या हुआ, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भी पीएम मोदी की यात्रा के बाद कहा था कि अगली शांति वार्ता भारत में आयोजित होनी चाहिए। जेलेंस्की को भरोसा है कि अगर भारत में शांति शिखर सम्मेलन का आयोजन होता है, तो यह युद्ध रुक सकता है। वहीं, जेलेंस्की से मुलाकात के दौरान पीएम मोदी ने कहा था कि भारत तटस्थ नहीं है, बल्कि वह शांति के पक्ष में खड़ा है। वहीं इस यात्रा से लौटते ही पीएम मोदी ने 26 अगस्त को राष्ट्रपति जो बाइडेन से भी बात की और शांति प्रयासों की जानकारी दी। इसी कड़ी में देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रूस के दौरे पर हैं और इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन को पीएम मोदी का पीस प्लान सौंपा है। यह देखने वाली बात होगी कि अक्टूबर में मॉस्को में होने वाली ब्रिक्स समिट में अगर पीएम मोदी जाते हैं, तो वहां पुतिन के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ता में इसके क्या नतीजे निकलते हैं।
सिंगापुर और ब्रुनेई जाने वाले पहले प्रधानमंत्री
वहीं सितंबर का महीना भी भारतीय कूटनीति के लिए काफी अहम रहा है। सितंबर में पीएम मोदी की सिंगापुर और ब्रुनेई का दौरा किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। प्रधानमंत्री मोदी अपने सिंगापुर समकक्ष लॉरेंस वोंग के निमंत्रण पर दो दिवसीय यात्रा पर वहां पहुंचे थे। प्रधानमंत्री मोदी 3 सितंबर को सुल्तान हाजी हसनल बोल्किया के निमंत्रण पर आधिकारिक यात्रा पर ब्रुनेई के बंदर सेरी बेगावान पहुंचे। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की ब्रुनेई की पहली द्विपक्षीय यात्रा थी। प्रधानमंत्री की एतिहासिक यात्रा भारत और ब्रुनेई के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 40वीं वर्षगांठ के मौके पर हुई।
इंडो-पैसिफिक रणनीति की आधारशिला बनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी
किंग्स कॉलेज लंदन में किंग्स इंडिया इंस्टीट्यूट में इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर हर्ष वी. पंत कहते हैं कि सितंबर की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी की सिंगापुर और ब्रुनेई यात्रा, विदेश मंत्री जयशंकर का दक्षिण चीन सागर पर भारत का रुख औऱ वियतनाम और मलेशिया के प्रधानमंत्रियों की भारत यात्रा दिखाती है कि भारत की विदेश नीति में दक्षिण-पूर्व एशिया का महत्व बढ़ गया है। केंद्र सरकार की एक्ट ईस्ट पॉलिसी, मोदी 2.0 की लुक ईस्ट पॉलिसी का अपग्रेड वर्जन है। जिसके बाद दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के हमारे संबंध मजबूत हुए हैं। पीएम मोदी के नेतृत्व में, यह नीति भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति की आधारशिला बन गई है, जो एक स्वतंत्र, खुली, समावेशी और नियम-आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देती है। इसी के तहत सिंगापुर में प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग के साथ पीएम मोदी की बातचीत के बाद भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के रास्ते खुले हैं। वहीं प्रधानमंत्री मोदी की दक्षिण चीन सागर में रणनीतिक रूप से स्थित ब्रुनेई की यात्रा से भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और इंडो-पैसिफिक विजन को और मजबूती मिली है। प्रोफेसर पंत के मुताबिक मोदी 3.0 में, वियतनाम भारत के सबसे महत्वपूर्ण दक्षिण पूर्व एशियाई भागीदार के तौर पर उभरा है। वियतनामी प्रधानमंत्री फाम मिन्ह चीन्ह की भारत यात्रा से रक्षा सहयोग, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर समझौते हुए हैं। वहीं मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम की हालिया भारत यात्रा को भी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के अहम भागीदार के तौर पर देखा जा सकता है।
न्यूयॉर्क जाएंगे पीएम मोदी
वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सितंबर में ही अमेरिका की यात्रा पर रवाना होने वाले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र के भविष्य शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए 22 सितंबर को न्यूयॉर्क के लॉन्ग आइसलैंड पर भारतीय-अमेरिकी समुदाय को संबोधित करेंगे। इसके बाद वे 26 सितंबर को उच्च स्तरीय संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र को संबोधित करेंगे। इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा 5 नवंबर को होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से कुछ समय पहले हो रही है।