ऐसी झीलों के प्राकृतिक बांध कमजोर होने या टूटने से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहने लगता है। इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लॉफ) कहा जाता है। इसमें पानी के साथ चट्टानें, मलबा और पत्थर भी तेजी से बहते हैं। इससे निचले इलाकों में जानमाल, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का जोखिम रहता है। ग्लॉफ की स्थिति में पानी और मलबे का तेज बहाव कम समय में बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। घेपन झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करना संभावित आपदा के जोखिम को कम करने की दिशा में अहम पहल है। एसडीएम कुनिका एकर्स ने बताया कि घेपन झील की निगरानी के लिए सूबे का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित कर दिया गया है।
समय रहते चेतावनी से बचाई जा सकेंगी जानें
अर्ली वार्निंग सिस्टम का प्रमुख उद्देश्य झील में होने वाले बदलावों पर नजर रखना और खतरे की आशंका पर संबंधित एजेंसियों को समय रहते सतर्क करना है। सिस्टम में लगाए गए सेंसर और निगरानी उपकरणों के माध्यम से जलस्तर, पानी के बहाव अथवा अन्य निर्धारित संकेतकों से जुड़ा डेटा एकत्र किया जा सकता है। सिस्टम की वास्तविक क्षमता और उसमें लगाए गए उपकरणों के आधार पर यह जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जा सकती है, जिससे जरूरत पड़ने पर चेतावनी जारी करने और बचाव की तैयारी के लिए समय मिल सके।